List of practice Questions

भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पटकथा में गाँवों की अहम् भूमिका है। बदलते समय के साथ, “डिजिटल ग्रामीण व्यवस्था” एक नई दिशा का प्रतीक बन चुकी है। यह व्यवस्था न केवल तकनीकी विकास का संकेत है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण का भी माध्यम है।

डिजिटल इंडिया मिशन के तहत अब ग्राम पंचायतों में इंटरनेट सुविधाएँ, डिजिटल भुगतान प्रणाली, ऑनलाइन शिक्षा और टेलीमेडिसिन सेवाएँ उपलब्ध हो रही हैं। किसान अब मोबाइल ऐप्स की सहायता से मौसम की जानकारी, फ़सल बीमा योजनाएँ और बाज़ार के दाम जान सकते हैं। इससे उनकी निर्भरता बिचौलियों पर कम हो गई है।

ग्राम स्तर पर ई-गवर्नेंस ने पारदर्शिता बढ़ाई है। जन्म प्रमाण-पत्र, भूमि रजिस्ट्रेशन, पेंशन योजनाएँ और सरकारी सब्सिडी जैसी सेवाएँ अब ऑनलाइन हो गई हैं। हालाँकि चुनौतियाँ अब भी हैं – जैसे डिजिटल साक्षरता की कमी, इंटरनेट की धीमी गति और बिजली की अनियमित आपूर्ति, फिर भी यह बदलाव धीरे-धीरे ग्रामीण जीवन को सशक्त बना रहा है। यदि सही दिशा में प्रयास जारी रहे, तो डिजिटल ग्रामीण व्यवस्था भारत को आत्मनिर्भर और समावेशी समाज की ओर अग्रसर कर सकती है।

भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पटकथा में गाँवों की अहम् भूमिका है। बदलते समय के साथ, “डिजिटल ग्रामीण व्यवस्था” एक नई दिशा का प्रतीक बन चुकी है। यह व्यवस्था न केवल तकनीकी विकास का संकेत है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण का भी माध्यम है।

डिजिटल इंडिया मिशन के तहत अब ग्राम पंचायतों में इंटरनेट सुविधाएँ, डिजिटल भुगतान प्रणाली, ऑनलाइन शिक्षा और टेलीमेडिसिन सेवाएँ उपलब्ध हो रही हैं। किसान अब मोबाइल ऐप्स की सहायता से मौसम की जानकारी, फ़सल बीमा योजनाएँ और बाज़ार के दाम जान सकते हैं। इससे उनकी निर्भरता बिचौलियों पर कम हो गई है।

ग्राम स्तर पर ई-गवर्नेंस ने पारदर्शिता बढ़ाई है। जन्म प्रमाण-पत्र, भूमि रजिस्ट्रेशन, पेंशन योजनाएँ और सरकारी सब्सिडी जैसी सेवाएँ अब ऑनलाइन हो गई हैं। हालाँकि चुनौतियाँ अब भी हैं – जैसे डिजिटल साक्षरता की कमी, इंटरनेट की धीमी गति और बिजली की अनियमित आपूर्ति, फिर भी यह बदलाव धीरे-धीरे ग्रामीण जीवन को सशक्त बना रहा है। यदि सही दिशा में प्रयास जारी रहे, तो डिजिटल ग्रामीण व्यवस्था भारत को आत्मनिर्भर और समावेशी समाज की ओर अग्रसर कर सकती है।

भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पटकथा में गाँवों की अहम् भूमिका है। बदलते समय के साथ, “डिजिटल ग्रामीण व्यवस्था” एक नई दिशा का प्रतीक बन चुकी है। यह व्यवस्था न केवल तकनीकी विकास का संकेत है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण का भी माध्यम है।

डिजिटल इंडिया मिशन के तहत अब ग्राम पंचायतों में इंटरनेट सुविधाएँ, डिजिटल भुगतान प्रणाली, ऑनलाइन शिक्षा और टेलीमेडिसिन सेवाएँ उपलब्ध हो रही हैं। किसान अब मोबाइल ऐप्स की सहायता से मौसम की जानकारी, फ़सल बीमा योजनाएँ और बाज़ार के दाम जान सकते हैं। इससे उनकी निर्भरता बिचौलियों पर कम हो गई है।

ग्राम स्तर पर ई-गवर्नेंस ने पारदर्शिता बढ़ाई है। जन्म प्रमाण-पत्र, भूमि रजिस्ट्रेशन, पेंशन योजनाएँ और सरकारी सब्सिडी जैसी सेवाएँ अब ऑनलाइन हो गई हैं। हालाँकि चुनौतियाँ अब भी हैं – जैसे डिजिटल साक्षरता की कमी, इंटरनेट की धीमी गति और बिजली की अनियमित आपूर्ति, फिर भी यह बदलाव धीरे-धीरे ग्रामीण जीवन को सशक्त बना रहा है। यदि सही दिशा में प्रयास जारी रहे, तो डिजिटल ग्रामीण व्यवस्था भारत को आत्मनिर्भर और समावेशी समाज की ओर अग्रसर कर सकती है।

दुनिया का सबसे बड़ा अधम –

हाँ, हाँ, दुनिया का सबसे बड़ा अधम नर वही था

जिसकी ज़बान से यह निकला था पहले-पहल –

भूमि यह मेरी है !

“भूमि यह मेरी है ?”

झूठा, मक्कार था !

असत्य, अन्याय का अवतार था !

दुनिया का सबसे बड़ा अधम !!

नीचे की धरती और ऊपर का आसमान,

पानी और पवन –

प्रकृति की देन हैं ये जीवमात्र के लिए,

इन पर है सबका अधिकार;

सबका समान अधिकार

हवा को क्या बाँटोगे ?

पानी को बाँटोगे ?

बाँटोगे नीले आसमान को ?

बाँट भी सकोगे क्या ?

धरती बेचारी बेबस थी –

पैरों के नीचे

अचल पड़ी थी, निरीह;

कह दिया –

“भूमि यह मेरी है” –

बाँट लिया टुकड़ों में,

एक मुट्ठी लोगों ने,

मानो माता के आँचल को दाँतों से चीरकर

बाँट लिया कुछ शैतान बच्चों ने;

टुकुर-टुकुर ताकते रह गए शरीफ़

रोती रही दुखिया बेचारी माँ !

दुनिया का सबसे बड़ा अधम !

जीवन के लिए जागना जितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी सोना है। दोनों क्रियाएँ एक-दूसरे के सहारे पर हैं। नींद का न आना भी एक विकार है, जिससे अनेक प्रकार की बाधाएँ आ सकती हैं और जो प्राणी रात-दिन सोता ही रहे, वह तो निष्क्रिय ही है। यदि दोनों क्रियाएँ एक-दूसरे की सहायता करती रहें – आदमी जागे कर्म करने के लिए, सोये विश्राम के लिए – तो जीवन सुखी होता है, लेकिन जागना जीवन का मुख्य लक्षण है, सोना अर्थात् – विश्राम, तो केवल उसका सहायक है। इसलिए, जागृति जीवन और अभ्युदय का चिह्न है और निद्रा पतन तथा ह्रास का। जागृति रजोगुण-प्रधान क्रिया है, निद्रा में तमोगुण की प्रधानता होती है। कम-से-कम सोने के लिए अनेक उपाय और साधन बताए गए हैं। अधिक-से-अधिक सोने के लिए आज तक किसी ने कोई उपाय नहीं बताया – उसी तरह, जैसे स्वस्थ रहने के लिए तरह-तरह के प्रयत्न किए जाते हैं, पर बीमारी के लिए भी किसी ने कोई प्रयत्न किया है, ऐसा कभी सुनने में नहीं आया। वास्तव में स्वास्थ्य का न होना ही बीमारी है – उसी तरह, जैसे प्रकाश का न होना ही अंधकार है। आदमी जितना ही कम सोये उतना ही जागरूक है, यहाँ तक कि कई विद्वानों का मत है, सोना कोई आवश्यक क्रिया नहीं। संभव है तपस्वियों के लिए सोना आवश्यक न हो, उनकी प्रकृति में रज और सत ही रह जाता हो, तम की सर्वथा हानि हो जाती हो, पर साधारण प्राणियों के लिए भी यही नियम लागू है कि मात्रा से अधिक सोने में हानि है, अतएव जब हम किसी राष्ट्र के विषय में जागृति की कामना करते हैं, तो इसका बोध यह होता है कि वह राष्ट्र मात्रा से अधिक तमोगुणी हो गया और उसमें जीवन की मात्रा ज़रूरत से कम है।

सबकी पीड़ा के साथ व्यथा अपने मन की जो जोड़ सके,

मुड़ सके जहाँ तक समय, उसे निर्दिष्ट दिशा में मोड़ सके।

युगपुरुष वही सारे समाज का विहित धर्मगुरु होता है,

सबके मन का जो अंधकार अपने प्रकाश से धोता है।

थे जहाँ सहस्रों वर्ष पूर्व, लगता है वहीं खड़े हैं हम,

है वृथा वर्ग उन गुफावासियों से कुछ बहुत बड़े हैं हम।

अनगढ़ पत्थर से लड़ो, लड़ो किटकिटा नखों से, दाँतों से

या लड़ो ऋक्ष के रोमगुच्छ-पूरित वज्रीकृत हाथों से।

या चढ़ विमान पर नर्म मुट्ठियों से गोलों की वृष्टि करो

आ जाय लक्ष्य में जो कोई, निष्ठुर हो सबके प्राण हरो।

ये तो साधन के भेद, किन्तु भावों में तत्त्व नया क्या है ?

क्या खुली प्रेम आँख अधिक ? भीतर कुछ बढ़ी दया क्या है ?

झर गई पूँछ, रोमान्त झरे, पशुता का झरना बाकी है,

बाहर-बाहर तन सँवर चुका, मन अभी सँवरना बाकी है।

मानव के संवाद करने, जानकारी प्राप्त करने और बाह्य दुनिया के समक्ष स्वयं को अभिनीत करने की शैली में परिवर्तन लाकर सोशल मीडिया आधुनिक युग का सर्वव्यापी पहलू बन गया है। इसने सूचना के प्रसार को अत्यंत त्वरित बना दिया है और यह सभी आयु समूहों के लिए एक आसान माध्यम बन चुका है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन, यूट्यूब, आदि उपयोगकर्ता को अपनी रचनात्मकता प्रदर्शित करने और सामाजिक तौर पर सक्रिय रहने का अवसर प्रदान करते हैं। इसका महत्त्व समय के साथ बढ़ता ही जा रहा है। यह न केवल व्यक्तिगत जीवन के लिए एक प्रभावी माध्यम है, बल्कि यह शिक्षा, व्यापार और यहाँ तक कि राजनीति में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसने सूचना के प्रसार को अत्यधिक तेज़ और सस्ता बना दिया है। इसके जरिए लोग घटनाओं का सीधा प्रसारण विश्व के किसी भी कोने से देख सकते हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षा के क्षेत्र में तो इसने एक क्रांति सी ला दी है। छात्रों के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है। व्यावसायिक गतिविधियाँ-जैसे उत्पादों और सेवाओं का प्रचार करना, ग्राहकों से जुड़ना, विपणन अभियानों को तेज़ी से फैलाने में भी यह मदद करता है।

सोशल मीडिया जहाँ सकारात्मक भूमिका अदा कर रहा है वहीं समाज पर इसका दुष्प्रभाव भी देखने को मिल रहा है। लोग तनाव और अवसाद से प्रभावित हो रहे हैं, अकेलापन बढ़ रहा है, अनिद्रा की समस्या बढ़ रही है। इसने आत्ममुग्धता को बढ़ाया है। अपनी निजी ज़िंदगी के बारे में लिखना, अपनी आत्मीय तस्वीरें शेयर करना, चौबीसों घंटे सोशल मीडिया पर उपस्थित रहना बेचैनी को बढ़ा सकता है। आपको याद रखना चाहिए कि इस मंच पर आने वाले आपके आभासी मित्र, सच्चे मित्र या हितैषी नहीं होते। लोग आपकी उपस्थिति का लाभ उठाकर आपको धोखा-धड़ी का शिकार बना लेते हैं। ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ की अपेक्षा हमारे मस्तिष्क की लय बिगाड़ देते हैं। वैज्ञानिक इसकी लत को खराब जीवन-शैली से होने वाली बीमारियों में सबसे ऊपर रखते हैं।

यद्यपि यह लोगों से जुड़ने, सूचना के प्रचार-प्रसार, समुदाय में अहम भूमिका निभा रहा है लेकिन इसके अति प्रयोग से बचना चाहिए।

फूल से बोली कली क्यों व्यस्त मुरझाने में है

फ़ायदा क्या गंध औ मकरंद बिखराने में है

तूने अपनी उम्र क्यों वातावरण में घोल दी

अपनी मनमोहक पँखुरियों की छटा क्यों खोल दी

तू स्वयं को बाँटता है जिस घड़ी से तू खिला

किन्तु इस उपकार के बदले में तुझको क्या मिला

मुझको देखो मेरी सब खुशबू मुझ ही में बंद है

मेरी सुंदरता है अक्षय अनछुआ मकरंद है

मैं पली काँटों में जब थी दुनिया तब सोती रहीं

मेरी ही क्या ये कभी किसी की भी कभी होती नहीं

ऐसी दुनिया के लिए सौरभ लुटाऊँ किसलिए

स्वार्थी समुदाय का मेला लगाऊँ किसलिए

फूल उस नादान की वाचालता पर चुप रहा

फिर स्वयं को देखकर भोली कली से ये कहा

ज़िंदगी सिद्धांत की सीमाओं में बँटती नहीं

ये वो पूँजी है जो व्यय से बढ़ती है घटती नहीं

नि:शब्द धीमी चाल और सदियों का साक्षी – जब कोई प्राणी हमारी धरती पर प्रकृति का सबसे शांत लेकिन सबसे मज़बूत प्रहरी बनकर खड़ा हो, तो उसका महत्त्व केवल जैव-विविधता तक सीमित नहीं रह जाता, वह हमारी संस्कृति, चेतना और पर्यावरण की आत्मा बन जाता है। कछुआ, जो समय की रेत पर अपने धैर्य और दीर्घायु के पदचिह्न छोड़ता आया है, आज खतरे में है। 23 मई को मनाया जाने वाला विश्व कछुआ दिवस केवल एक दिन नहीं, बल्कि पुकार है, उस मौन जीवन के लिए, जिसे हमने वर्षों तक नज़रअंदाज किया और जो आज हमसे बचाव की गुहार कर रहा है।

मान्यता है कि कछुए धरती पर करोड़ों वर्षों से अस्तित्व में हैं। उन्होंने हिम युगों, महाविनाशों और भूगर्भीय परिवर्तनों को झेला है। उनके अस्तित्व की स्थिरता, उनकी धीमी लेकिन स्थायी जीवन-शैली का प्रमाण है। मगर दुखद है कि आज जिन संकटों का वे सामना कर रहे हैं वे किसी प्राकृतिक आपदा के नहीं, बल्कि मानवीय लालच और लापरवाही के कारण हैं। विश्व में ज्ञात 350 से अधिक कछुआ प्रजातियों में से लगभग 60 फीसदी प्रजातियाँ संकटग्रस्त या विलोप के कगार पर हैं। समुद्री कछुए-जैसे मादा ऑलिव रिडले, जो हजारों किलोमीटर तैरकर अंडे देने के लिए ओडिशा तट पर आती है, को जल और प्रकाश प्रदूषण तथा मानवीय हस्तक्षेप से भारी खतरा है। इन मूक प्राणियों के लिए संकट के प्रमुख कारणों में प्लास्टिक प्रदूषण, समुद्री तटों का अतिक्रमण, अवैध व्यापार और जलवायु परिवर्तन है।

कछुआ हमें सिखाता है कि दौड़ना ज़रूरी नहीं, टिके रहना ज़्यादा ज़रूरी है। यह भी कि मौन शक्ति की एक अलग भाषा है, जो शब्दों से नहीं, बल्कि कर्म से बोलती है। उनकी धीमी चाल में हमें भविष्य की गूँज सुनाई देती है कि यदि हम उन्हें बचा पाए तो खुद को बचा पाएँगे।

संस्कृति और सभ्यता - ये दोनों दो शब्द हैं और उनके अर्थ भी अलग-अलग हैं। सभ्यता मनुष्य का वह गुण है जिससे वह अपनी बाहरी उन्नति करता है। संस्कृति मनुष्य का वह गुण है जिससे वह अपनी भीतरी उन्नति करता है, दया, ममता और परोपकार आदि सीखता है, गीत-नाद, कविता, चित्र और मूर्ति से आनन्द लेने की योग्यता हासिल करता है। एक वह भी समय था जब आदमी को घर बनाना नहीं आता था, जब वह पेड़ की छाया या पहाड़ की खोह में वास करता था; जब खेती करना भी नहीं आता था और वह कन्द-मूल खाकर गुजारा करता था; जब उसे कपड़ा बुनना भी नहीं आता था और वह या तो निर्वस्त्र रहता था या पेड़ों की छाल या जानवरों की खाल पहनकर रहता था। इस हालत को मनुष्य की असभ्यता की हालत कहते हैं। लेकिन, इस हालत से निकलकर आदमी ज्यों-ज्यों आगे बढ़ा, त्यों-त्यों वह सभ्य होता गया। यानी जब आदमी खेती करके अनाज उपजाने लगा, अनाज को आग से पकाकर खाने लगा, घर बनाकर रहने और कपड़े बुनकर उन्हें पहनने लगा, तब वह असभ्यता से निकलकर सभ्यता की ओर आने लगा। आज भी रेलगाड़ी, मोटर और हवाई जहाज, लंबी-चौड़ी सड़कें और बड़े-बड़े मकान, अच्छा भोजन और अच्छी पोशाक, ये सभ्यता की पहचान हैं और जिस देश में इनकी जितनी ही अधिकता है उस देश को हम उतना ही सभ्य मानते हैं। मगर, संस्कृति इन सबसे भिन्न है। वह मोटर नहीं, मोटर बनाने की कला है; मकान नहीं, मकान बनाने की रुचि है। भोजन की सामग्री हम सभ्यता के जरिये पैदा करते हैं, लेकिन जिस ढंग से हम भोजन तैयार करते हैं और जिस कला से हम उसे खाते हैं वह हमारी संस्कृति कहलाती है।

जो नहीं हो सके पूर्ण-काम

मैं उनको करता हूँ प्रणाम

कुछ कुंठित औ' कुछ लक्ष्य-भ्रष्ट

जिनके अभिमंत्रित तीर हुए;

रण की समाप्ति के पहले ही

जो वीर रिक्त तूणीर हुए !

– उनको प्रणाम !

जो छोटी-सी नैया लेकर

उतरे करने को उदधि-पार;

मन की मन में ही रही, स्वयं

हो गए उसी में निराकार !

– उनको प्रणाम !

जो उच्च शिखर की ओर बढ़े

रह-रह नव-नव उत्साह भरे;

पर कुछ ने ले ली हिम-समाधि

कुछ असफल ही नीचे उतरे !

– उनको प्रणाम !

एकाकी और अकिंचन हो

जो भू-परिक्रमा को निकले;

हो गए पंगु, प्रति-पद जिनके

इतने अदृष्ट के दाव चले !

– उनको प्रणाम !

कृत-कृत्य नहीं जो हो पाए;

प्रत्युत फाँसी पर गए झूल

कुछ ही दिन बीते हैं, फिर भी

यह दुनिया जिनको गई भूल

– उनको प्रणाम !

लेखक और प्रकाशक एक-दूसरे के पूरक होते हैं। यदि प्रकाशक नहीं हों, तो लेखकों की कृतियों को लोक-लोचन के सम्मुख प्रस्तुत कौन करेगा और यदि लेखक नहीं हों, तो प्रकाशन के व्यवसाय की शुरुआत कैसे हो, प्रकाशक का जन्म ही कहाँ से हो ?

यह सत्य है कि मूल लेखक है और प्रकाशक उसका तना है, लेकिन तने के विस्तार को सब लोग देखते हैं और मूल की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। वह तो अधिकतर भूमिष्ठ ही रहता है। प्रकाशक की अट्टालिका, मोटर, शानशौकत अब सभी प्रमुख नगरों में हम देख सकते हैं। पर बेचारे लेखक को हम ढूँढने से ही पा सकते हैं।

इस स्वाभाविक स्थिति की विषमता लेखक और प्रकाशक के पारस्परिक सम्बन्धों में तनाव पैदा करती है। मूल और तने के बीच का तनाव कभी सुफल नहीं ला सकता। इस विषम स्थिति से निकलने के लिए दोनों को यह सोचना होगा कि सामंजस्य कैसे स्थापित हो ?

सोचना इसलिए भी जरूरी है कि कुछ लोग इस तनाव को बढ़ाने की ही दिशा में काम करते नज़र आ रहे हैं। वे लेखक से कहते हैं, देखो, तुम्हारा कितना शोषण हो रहा है, ये प्रकाशक जोंक हैं जोंक। इनसे बचो। और प्रकाशक से कहा जाता है, अजी साहब, इस लेखक को जानता कौन था ? यह तो आप हैं, जिसने इसे आसमान पर चढ़ाया !

तनाव बढ़ता जा रहा है। दोनों की हानि हो रही है। यह तनाव दोनों को चौपट कर सकता है। अत: इस पर चिंतन करना अनिवार्य है।

प्रकृति के कई रंग हैं और उन रंगों में कोई होड़ नहीं है। रंगों की इस विशाल दुनिया में हम भी तो एक रंग ही हैं। पर हमारे साथ दिक्कत है। एक तो हमें अपने रंगों का पता नहीं है। दूसरा, हम दूसरों के रंगों से डरते हैं। हम भूल जाते हैं कि जीवन बहुरंगी है। दूसरे के जैसा होने की या उन्हें अपने जैसा करने की हमारी कोशिशों का कोई बहुत अर्थ भी नहीं है। कारण जबर्दस्ती चढ़ाए गए रंग देर तक टिकते ही नहीं है। सबको एक ही रंग में रंगने की कोशिश से बेहतर है कि हम एक-दूसरे को अपना सहयोग दें। दो रंग जुड़ते हैं तो एक नया ही रंग बन जाता है। इसी तरह आपस के साथ से हम भी कुछ नए रंग जिंदगी में जोड़ सकते हैं।

सुख सतरंगी है तो दुख के भी कई रंग हैं। फिर, सफेद और काले रंग के भी कई प्रतिरूप होते हैं। गायिका एमी ग्रांट कहती हैं, ‘काले रंग के बिना किसी भी रंग को गहराई नहीं मिलती।’ बात केवल परछाईं की नहीं है, पूर्णता की है। ज्यादातर लोग निराशा, अकेलापन, चुनौती, डर और उदासी के रंगों से दूर भागते हैं। वे जीवन में मुश्किल समय आते ही बेचैन हो उठते हैं जबकि मनुष्य की विकास यात्रा यही कहती है कि दुख, दर्द, कड़ी मेहनत, धैर्य और चुनौतियों के रंगों से मिलकर ही हमें जीत की चमक मिलती है। लेखक रे विलियम्स का मानना है कि बड़ी बारीकी से हम अपने दिमाग की नकारात्मक घेरबंदी करते चले जाते हैं, जो है उसके बारे में ध्यान नहीं देते, अभावों के विषय में सोचते चले जाते हैं और जीवन को जटिल बना लेते हैं।

प्रकृति हर दिन होली खेलती है, एक ही दिन में कई रंग बदलती है। दुख-दर्द का कोई रंग स्थायी नहीं होता। हमारी दुनिया रंगीन हो जाती है जब हम अपने रंगों से संतुष्ट हो जाते हैं और दूसरों का देखकर खुश होते हैं।

शब्द तो आए बहुत बाद में

संख्याएँ हमारे साथ जन्म से ही हैं

गर्भ में जब

निर्माण हो रहा था हमारी हड्डियों का

रक्तकणों और कोशिकाओं का

साथ-साथ संख्याएँ भी निर्मित होती जा रही थीं

एक हमारी देह की इकाई की वो संख्या है

जिसमें समाहित हैं सारी संख्याएँ

दो आँखों में स्थित है दो

तीन है उँगलियों के तीन जड़ों में,

हृदय के हिस्से हैं चार

और पाँच का निवास

पाँच उँगलियों में है

आगे की सारी संख्याओं को

देह में तलाशना बहुत मज़ेदार खेल है

नौ को तो अमर कर गए कबीर

कि नौ द्वारे का पिंजरा ता में पंछी पौन……

मुझे तो बहुत चकित करती है यह बात

कि देह की संख्याएँ आठ की संख्या निर्धारित करती है

क्योंकि आठ तरह से ही मुड़ती है यह देह

इसीलिए तो कृष्ण कहलाते हैं अष्टावक्र

सात रंग दिखते हैं आँखों को

और जीभ छह तरह के स्वादों को पहचानती है

इसीलिए तो भोजन को कहा गया षट्रस

देखिए एक से बना कैसा प्यारा शब्द

एका

एक जो दूसरे के बिना रह नहीं सकता

जिसके बिना संभव नहीं थी

इस दुनिया की शुरुआत

मैंने तो शुरू में ही कही थी यह बात

कि संख्याएँ शब्दों की पूर्वज हैं

शब्द तो आए बहुत बाद में

और आते ही चले जा रहे हैं

जबकि संख्याएँ सबकी सब आ चुकी हैं

क्या कोई नई संख्या बता सकते हैं आप।

तकनीक की हर नई छलांग उत्साह भी पैदा करती है और चिंता भी लाती है। ‘डीपमाइंड’ और ‘ओपनएआई’ जैसी कंपनियों द्वारा बनाए गए नए स्मार्ट चैटबॉट्स ने लोगों का मन मोह लिया है। इनमें इंसानों की तरह सवालों के जवाब देने की क्षमता है। ये बारीकियों की व्याख्या कर सकते हैं, साथ ही, तथ्यों को विश्वास के साथ साझा भी कर सकते हैं। ये चैटबॉट नए नहीं हैं। इंसानों के संवाद करने में सक्षम कंप्यूटर प्रोग्राम या चैटबॉट्स की अवधारणा का 1950 के दशक से ही एक इतिहास रहा है। शुरुआती चैटबॉट्स में से एक एलिजा है, जिसे 1960 के दशक में कंप्यूटर वैज्ञानिक जोसेफ वीजेनबाम ने प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रौद्योगिकी का परीक्षण करने के लिए बनाया था। यह कीवर्ड और वाक्यांशों का जवाब देकर सहज ढंग से संवाद कर सकता था। चैटजीपीटी को अभी तक का सबसे उन्नत चैटबॉट माना जा रहा है।

चैटजीपीटी को ओपनएआई द्वारा विकसित किया गया है। यह भाषा का एक मॉडल है, जो इंसानों की तरह ही प्रतिक्रिया करता है। कुछ चैटबॉट ज्यादा जटिल संवाद करने में भी सक्षम होते हैं और समय के साथ अपनी प्रतिक्रियाओं को बेहतर बनाने के लिए मशीन लर्निंग एल्गोरिदम का उपयोग करते हैं। अभी चैटजीपीटी सहित अधिकांश चैटबॉट्स अपने लिए सूचनाएँ एक विशाल, लेकिन एक सीमित दायरे से ही प्राप्त करते हैं। जैसे चैटजीपीटी का ताजा संस्करण 2021 के अंत तक संचित हुई सूचनाओं तक सीमित है। चैटबॉट अपनी प्रतिक्रिया में कहीं अधिक मुखर हैं और किसी जिज्ञासा पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करते हैं जबकि ऐसा करना गूगल या बिंग के लिए मुश्किल है। हालाँकि, चैटजीपीटी की इंसानों जैसी प्रतिक्रिया में सूचना स्रोत का जिक्र नहीं होता और न ही कोई लिंक या उद्धरण दिया जाता है। इसके साथ आसान बातचीत ने दुनियाभर में धूम मचा दी है। उत्साही लोग तरह-तरह के सवाल पूछ रहे हैं। हर संवाद के साथ चैटबॉट का भी परीक्षण और प्रशिक्षण चल रहा है।

फिर भी एक चैटबॉट सब कुछ नहीं जानता, जबकि इसका इजहार या इसकी अभिव्यक्ति या लेखन इंसानों की तरह ही है। इसकी जानकारी गलत और दोषपूर्ण भी हो सकती है। इनको अभी भी कई बाधाओं या हदों को पार करना है, सूचनाओं को बढ़ाना है। कई भाषाओं के विकल्पों के साथ डिजिटल संचार पाठ से आवाज की ओर बढ़ रहा है। हर शब्द स्वरबद्ध होता जा रहा है। एलेक्सा जैसे सर्च इंजन और आवाज आधारित अन्य सहायकों से आगे जाने के लिए चैटबॉट्स को ज्यादा सूचनाओं की जरूरत पड़ेगी। लोगों की जिज्ञासाओं को शब्दों से ही नहीं स-स्वर शांत करना होगा।

स्पैरो चैटबॉट जीपीटी की तुलना में कुछ बेहतर है। जल्द ही गलत सवालों को पहचानने वाले चैटबॉट भी आ जाएँगे। अगर समझदारी से इस्तेमाल हुआ, तो चैटबॉट हमारे बहुत काम आएँगे।

अकेलेपन से जो लोग दुखी हैं,

वृत्तियाँ उनकी

निश्चय ही, बहिर्मुखी हैं।

सृष्टि से बाँधने वाला तार

उनका टूट गया है;

असली आनन्द का आधार

छूट गया है।

उद्गम से छूटी हुई नदियों में ज्वार कहाँ ?

जड़-कटे पौधों में जीवन की धार कहाँ ?

तब भी, जड़-कटे पौधों के ही समान

रोते हैं ये उखड़े हुए लोग बेचारे;

जीना चाहते हैं भीड़-भम्भड़ के सहारे।

भीड़, मगर, टूटा हुआ तार

और तोड़ती है

कटे हुए पौधों की

जड़ नहीं जोड़ती है।

बाहरी तरंगों पर जितना ही फूलते हैं;

हम अपने को उतना ही और भूलते हैं।

जड़ जमाना चाहते हो

तो एकान्त में जाओ;

अगम-अज्ञात में अपनी सोरें फैलाओ।

अकेलापन है राह

अपने आपको पाने की;

जहाँ से तुम निकल चुके हो,

उस घर में वापस जाने की।

प्रगति मैदान में बहुत से मेले लगते हैं, लेकिन विश्व पुस्तक मेला का अपना आनंद है। यह मेला नहीं, पुस्तकों के साथ जीने, उन्हें महसूस करने का उत्सव है। बीते तीन दशकों से, जब से सूचना प्रौद्योगिकी का प्रादुर्भाव हुआ है, मुद्रण तकनीक से जुड़े लोग इसी भय में जीते रहे हैं कि कहीं कंप्यूटर, टी.वी., सी.डी. की दुनिया छपे हुए अक्षरों को अपनी बहुरंगी चकाचौंध में उदरस्थ न कर ले। जैसे-जैसे चिंताएँ बढ़ी, पुस्तकों का बाजार भी बढ़ता गया। उसे बढ़ना ही था – आखिर साक्षरता दर बढ़ रही है, ज्ञान पर आधारित जीविकोपार्जन करने वालों की संख्या बढ़ रही है। पुस्तकें इंसान को वैचारिक और मानसिक दुविधाओं के प्रश्नों का विकल्प देती हैं।

असल में विश्व पुस्तक मेला सिर्फ किताब खरीदने-बेचने की जगह नहीं है। यह पुस्तक प्रेमियों की जरूरत को एक स्थान पर पूरा करने का केवल बाजार नहीं है क्योंकि केवल पुस्तक खरीदने के लिए तो दर्जनों वेबसाइट उपलब्ध हैं, जो घर बैठे किताबें पहुँचा देती हैं, बल्कि एक उत्सव है। दरअसल, पुस्तक भी इंसानी प्यार की तरह होती है, जिससे जब तक बात न करो, सामने न हो, स्पर्श न करो, अपनत्व का अहसास नहीं होता। फिर, तुलनात्मकता के लिए एक ही स्थान पर एक साथ इतने सजीव उत्पाद मिलना एक बेहतर प्रचार का विकल्प और मनोवृत्ति भी है। पुस्तक मेला एक त्योहार है, पाठकों, लेखकों, व्यापारियों, बच्चों का। हर दिन कई सौ पुस्तकों का लोकार्पण, बीस-पच्चीस गोष्ठी-विमर्श, दस-पंद्रह लेखकों से बातचीत के सत्र और बच्चों की गतिविधियाँ। ढेर सारे विचार, मतांतर एक ही छत के नीचे, पर सभी का एक ही लक्ष्य, ज्ञान को विस्तार मिले।

दिन चढ़ते ही लोग कंधे छीलती भीड़ में उचक-उचक कर लेखकों को पहचानने का प्रयास करते हैं। कहीं कविता पाठ चलता है, तो कहीं पर व्यंग्य और कहानी पेश करने का आयोजन। इस मेले की खासियत यह भी है कि दूर-दराज से आए और नए लेखक अपनी पांडुलिपियाँ लेकर प्रकाशकों को तलाशते दिखते हैं। विदेशी मंडप में भले ही अधिकांश पुस्तकें केवल प्रदर्शन के लिए होती हैं, लेकिन कुछ लोग इनसे प्रेरणा प्राप्त करते भी दिखाई देते हैं। बच्चों की नैसर्गिक रचनात्मक क्षमता को बढ़ावा देने के लिए बाल मंडप एक महत्त्वपूर्ण आकर्षण होता है। पुस्तक मेला में दिल और दिमाग, दोनों पुस्तक के साथ धड़कते-मचलते हैं, तभी तो यह मेला नहीं हैं, आनंदोत्सव है। पुस्तकों का वसंतोत्सव है, जो आश्वस्त करता है कि मुद्रित शब्दों की शक्ति, सहकार और सौंदर्य अब भी विद्यमान है।

सुचारित्र्य के दो सशक्त स्तम्भ हैं – प्रथम - सुसंस्कार और द्वितीय - सत्संगति। सुसंस्कार जीवन की सत्संगति व सत्कर्मों की अर्जित संपत्ति है और सत्संगति वर्तमान जीवन की दुर्लभ विभूति है। जिस प्रकार कुधातु की कठोरता और कालिख पारस के स्पर्श से कोमलता और कमनीयता में बदल जाती है, ठीक उसी प्रकार कुमार्गी का कालुष्य सत्संगति से स्वर्णिम आभा में परिवर्तित हो जाता है। सतत सत्संगति से विचारों को नई दिशा मिलती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छे कर्मों के लिए प्रेरित करते हैं। परिणामत: सुचरित्र का निर्माण होता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है – “महाकवि टैगोर के पास बैठने मात्र से ऐसा प्रतीत होता था मानो भीतर का देवता जाग गया हो।”

वस्तुत: चरित्र से ही जीवन की सार्थकता है। चरित्रवान व्यक्ति ही समाज की शोभा है, शक्ति है। सुचारित्र्य से व्यक्ति ही नहीं, समाज भी सुवासित होता है और इस सुवास से राष्ट्र यशस्वी बनता है। विदुर जी की उक्ति अक्षरश: सत्य है कि सुचरित्र के बीज हमें भले ही वंश परंपरा से प्राप्त हो सकते हैं पर चरित्र-निर्माण व्यक्ति के अपने बलबूते पर निर्भर है। आनुवंशिक परंपरा, परिवेश और परिस्थिति उसे केवल प्रेरणा दे सकते हैं पर उसका अर्जन नहीं कर सकते; वह व्यक्ति को उत्तराधिकार में प्राप्त नहीं होता। व्यक्ति-विशेष के शिथिल चरित्र होने से पूरे राष्ट्र पर चरित्र संकट उपस्थित हो जाता है क्योंकि व्यक्ति पूरे राष्ट्र का एक घटक है। अनेक व्यक्तियों से मिलकर एक परिवार, अनेक परिवारों से एक कुल, अनेक कुलों से एक जाति या समाज और अनेकानेक जातियों और समाज-समुदायों से मिलकर ही एक राष्ट्र बनता है। आज जब लोग राष्ट्रीय चरित्र निर्माण की बात करते हैं, तब वे स्वयं उस राष्ट्र के आचरक घटक हैं – इस बात को विस्मृत कर देते हैं।

मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,

मैं कब कहता हूँ जीवन-मरु नंदन-कानन का फूल बने ?

काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,

मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने ?

मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले ?

मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले ?

मैं कब कहता हूँ विजय करूँ मेरा ऊँचा प्रासाद बने ?

या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुँधली-सी याद बने ?

पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे ?

नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे ?

मैं प्रस्तुत हूँ चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने –

फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गति-रोधक शूल बने !