धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने
मैके में आई बेटी की तरह मगन है
फूली सरसों से आके लिपट गई है
जैसे दो हमजोली सखियाँ गले मिली हैं
सारंगी बजती है खेतों की गोदी में
दल-के-दल पक्षी उड़ते हैं मीठे स्वर के
अनावरण यह प्राकृत छवि की अमर भारती
रंग-बिरंगी पंखुरियों की खोल चेतना
सौरभ से मह-मह महकाता है दिगंत को
मानव-मन को भर देता है दिव्य दीप्ति से
शिव के नंदी-सा पानी पीता नदिका में
निर्मल नभ अवनी के ऊपर बिसुध खड़ा है
काल काग की तरह ठूँठ पर गुमसुम बैठा
सोई आँखों देख रहा है दिवावसान को।
काव्यांश में धूप को किस रूप में चित्रित किया गया है ?
फूली हुई सरसों से आकर कौन लिपट गई ?
खेतों की गोदी में सारंगी बजती है –
ठूँठ पर बैठे काल की तुलना किससे और किस आधार पर की गई है ?
नदी में पड़ते आकाश के प्रतिबिंब के बारे में कवि ने क्या कल्पना की है ? स्पष्ट कीजिए।
काव्यांश के आधार पर ग्रामीण प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन कीजिए।