Comprehension

मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,

मैं कब कहता हूँ जीवन-मरु नंदन-कानन का फूल बने ?

काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,

मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने ?

मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले ?

मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले ?

मैं कब कहता हूँ विजय करूँ मेरा ऊँचा प्रासाद बने ?

या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुँधली-सी याद बने ?

पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे ?

नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे ?

मैं प्रस्तुत हूँ चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने –

फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गति-रोधक शूल बने !

Question: 1

मैं कब कहता हूँ – पंक्ति में ‘कब’ क्या इंगित करता है ?

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'मैं कब कहता हूँ' का अर्थ है 'मैंने ऐसा कभी नहीं चाहा'। सोचिए कि यह कवि की किस मनोवृत्ति को दिखाता है।
  • सदैव निराकांक्षी
  • सदैव आकांक्षी
  • सदैव अभिलाषी
  • सदैव अस्थिर
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The Correct Option is A

Solution and Explanation

चरण 1: कवि की चाहतों की सूची बनाना:
पद्यांश में कवि कहता है कि वह यह नहीं चाहता कि जग उसकी गति के अनुकूल बने, जीवन-मरु फूल बने, युद्ध में चोट न मिले, प्यार में प्राप्ति मिले या विजय पर ऊँचा प्रासाद बने।
हर बात से पहले 'मैं कब कहता हूँ' आता है।

चरण 2: निष्कर्ष निकालना:
जब कोई व्यक्ति हर सुख और लाभ के बारे में कहे कि 'मैंने यह कब माँगा', तो वह किसी चीज़ की आकांक्षा नहीं रखता।
इसलिए 'कब' शब्द कवि की निराकांक्षा, यानी कोई भी अपेक्षा न रखने के भाव को प्रकट करता है।

चरण 3: विलोपन विधि:
आकांक्षी और अभिलाषी - दोनों का अर्थ है इच्छा रखने वाला, जो पद्यांश के भाव के उलटे हैं।
अस्थिर का अर्थ है डगमगाने वाला, पर कवि संघर्ष के लिए दृढ़ता से तैयार है।
केवल 'सदैव निराकांक्षी' ही पंक्ति के भाव से मेल खाता है।

अंतिम उत्तर:
सही विकल्प (1) सदैव निराकांक्षी है।
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Question: 2

संसार के विषय में कवि का क्या विचार है ?

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पहली पंक्ति 'जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने' को 'मैं कब कहता हूँ' के साथ पढ़िए। कवि संसार को बदलना चाहता है या नहीं?
  • संसार उसकी गति से चले
  • संसार तीव्र गति से चले
  • संसार धीमी गति से चले
  • संसार अपनी गति से चले
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The Correct Option is D

Solution and Explanation

चरण 1: विकल्पों को पंक्ति से मिलाना:
पंक्ति है - 'मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने'।
पहला विकल्प 'संसार उसकी गति से चले' पंक्ति के शब्दों जैसा दिखता है, पर 'कब कहता हूँ' उसे नकार देता है। इसलिए यह गलत है।

चरण 2: गति की बात परखना:
कवि ने संसार की गति के तेज़ या धीमे होने की कोई बात नहीं की।
अतः 'तीव्र गति से चले' और 'धीमी गति से चले' - दोनों विकल्प पद्यांश से समर्थित नहीं हैं।

चरण 3: शेष विकल्प का औचित्य:
जब कवि संसार से अपने अनुकूल बनने की अपेक्षा नहीं रखता, तो उसका भाव यही है कि संसार अपने ढंग से, अपनी गति से चले।
यह कवि की स्वाभिमानी और संघर्षशील दृष्टि को दिखाता है।

अंतिम उत्तर:
सही उत्तर विकल्प (4) संसार अपनी गति से चले।
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Question: 3

“वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने” से कवि का तात्पर्य है :

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पद्यांश में काँटा विपत्ति का और फूल सुख का प्रतीक है। शाब्दिक नहीं, प्रतीकात्मक अर्थ चुनिए।
  • जीवन से विपत्तियों का समाप्त हो जाना
  • काँटों का फूलों की शरण में चले जाना
  • विपत्तियों का सुखद परिस्थितियों में ढल जाना
  • काँटे का कोमल फूल के रूप में बदल जाना
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The Correct Option is C

Solution and Explanation

चरण 1: शब्दों का अर्थ:
'घटकर' - अपनी कठोरता कम करके। 'प्रांतर' - खुला मैदान या वन-प्रदेश। 'ओछा फूल' - छोटा और साधारण फूल।
पद्यांश में काँटा कठिनाई है और फूल सुख का संकेत है।

चरण 2: शाब्दिक और लाक्षणिक अर्थ में अंतर:
शाब्दिक रूप से पंक्ति काँटे के फूल बनने की बात करती है, पर कविता में काँटा और फूल प्रतीक हैं।
इसलिए कवि का असली आशय है कि जीवन की कठिनाइयाँ सरल और सुखद स्थितियों में न बदल जाएँ; वह उनका सामना करना चाहता है।
इसी कारण विकल्प (4), जो केवल शाब्दिक अर्थ है, सही तात्पर्य नहीं है।

चरण 3: शेष विकल्प हटाना:
विकल्प (1) में विपत्ति का अंत है, बदलना नहीं। विकल्प (2) में शरण लेने की बात है, जो पंक्ति में नहीं है।
अतः विपत्तियों का सुखद परिस्थितियों में ढलना ही सही आशय है।

अंतिम उत्तर:
सही विकल्प (3) है।
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Question: 4

कवि के अनुसार जीवन की सार्थकता क्या है ?

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अंतिम दो पंक्तियाँ पढ़िए जिनमें कवि हर बाधा का सामना करने को 'प्रस्तुत' है।
  • संघर्ष एवं दुखों से लड़ने में
  • सुख एवं सुविधाजनक स्थिति में
  • परस्पर ईर्ष्या-द्वेष में
  • शक्ति प्रदर्शन एवं नेतृत्व में
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The Correct Option is A

Solution and Explanation

चरण 1: विलोपन से आरंभ:
'सुख एवं सुविधाजनक स्थिति' - कवि नंदन-कानन का फूल या ऊँचा प्रासाद नहीं चाहता, इसलिए यह विकल्प गलत है।
'शक्ति प्रदर्शन एवं नेतृत्व' - कवि नेतृत्व छिनने की परवाह नहीं करता, इसलिए यह भी गलत है।
'परस्पर ईर्ष्या-द्वेष' - इसका पद्यांश में कहीं संकेत नहीं है।

चरण 2: बचे हुए विकल्प का प्रमाण:
कवि युद्ध में तीखी चोट सहने को तैयार है और चाहता है कि धूल का कण-कण भी उसके मार्ग में शूल बने।
यह स्वेच्छा से कठिनाइयों को स्वीकार करने का भाव है।
इससे सिद्ध होता है कि कवि जीवन को संघर्ष में ही सार्थक मानता है।

चरण 3: संदेश:
पद्यांश यह संदेश देता है कि सच्चा जीवन बाधाओं से भागने में नहीं, उनसे जूझने में है।

अंतिम उत्तर:
सही विकल्प (1) संघर्ष एवं दुखों से लड़ने में है।
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Question: 5

स्तंभ-I को स्तंभ-II से सुमेलित कीजिए और सही विकल्प चुनकर लिखिए :

स्तंभ-Iस्तंभ-II
1.जीवन-मरु(i)सुखद परिस्थितियाँ
2.नंदन-कानन(ii)विपरीत परिस्थितियाँ
3.गति-रोधक(iii)उत्तरोत्तर उन्नति में बाधक

विकल्प :

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मरु अर्थात् रेगिस्तान कठिनाई का, नंदन-कानन सुख का प्रतीक है और 'रोधक' का अर्थ है रोकने वाला।
  • 1-(i), 2-(ii), 3-(iii)
  • 1-(ii), 2-(i), 3-(iii)
  • 1-(iii), 2-(ii), 3-(i)
  • 1-(iii), 2-(i), 3-(ii)
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The Correct Option is B

Solution and Explanation

चरण 1: सबसे स्पष्ट जोड़ी से शुरू करना:
'गति-रोधक' शब्द में ही 'रोधक' अर्थात् रोकने वाला अर्थ है, इसलिए यह 'उत्तरोत्तर उन्नति में बाधक' (iii) से जुड़ेगा।
इस आधार पर विकल्प (3) और (4) हट जाते हैं, क्योंकि उनमें 3 का मेल (i) या (ii) से है।

चरण 2: शेष दो विकल्पों में चुनाव:
विकल्प (1) में जीवन-मरु को सुखद परिस्थितियाँ माना गया है, जो गलत है, क्योंकि मरुस्थल कठिनाई का प्रतीक है।
पद्यांश में कवि कहता है कि वह नहीं चाहता कि 'जीवन-मरु नंदन-कानन का फूल बने', अर्थात् कठिन जीवन सुखमय बन जाए।
इससे स्पष्ट है कि जीवन-मरु विपरीत और नंदन-कानन सुखद परिस्थितियों का सूचक है।

चरण 3: पुष्टि:
इस प्रकार 1-(ii), 2-(i), 3-(iii) का क्रम पूर्ण रूप से सही बैठता है।

अंतिम उत्तर:
सही विकल्प (2) है।
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