तिरती है समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुख की छाया –
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया –
यह तेरी रण-तरी
भरी आकांक्षाओं से,
घन, भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर
उर में पृथ्वी के, आशाओं से
नवजीवन की, ऊँचा कर सिर,
ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के बादल !