Question:medium

नितरां नीचोऽस्मीति त्वं खेदं कूप! कदापि मा कृथा:। 
अत्यन्तसरसहृदयो यत: परेषां गुणग्रहीताऽसि।। (सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए) 
 

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यहाँ 'गुण' शब्द के दो अर्थ हैं: कुएँ के सन्दर्भ में 'रस्सी' और व्यक्ति के सन्दर्भ में 'अच्छे गुण'।
Updated On: Feb 19, 2026
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Solution and Explanation

सन्दर्भ: प्रस्तुत श्लोक में कवि ने ‘कूप’ (कुएँ) को संबोधित करते हुए मानवीय गुणों की शिक्षा दी है। यह श्लोक प्रतीकात्मक रूप से विनम्रता, परोपकार और गुणग्राहकता का संदेश देता है। कवि कुएँ के माध्यम से यह बताना चाहता है कि बाहरी स्थिति के आधार पर स्वयं को हीन नहीं समझना चाहिए।

अनुवाद: हे कूप! “मैं अत्यन्त नीचा हूँ” ऐसा कहकर तुम कभी भी शोक मत करो।
क्योंकि तुम अत्यन्त सरस (उदार और कोमल हृदय वाले) हो, इसलिए तुम दूसरों के गुणों को ग्रहण करने वाले हो।

व्याख्या: यहाँ ‘नीच’ शब्द का प्रयोग गहराई के अर्थ में किया गया है, क्योंकि कुआँ भूमि के भीतर नीचे स्थित होता है। कवि कहता है कि केवल नीचे होने के कारण तुम्हें दुखी नहीं होना चाहिए।
वास्तव में कुआँ सबको शीतल जल प्रदान करता है, अतः वह अत्यन्त उदार और परोपकारी है। वह वर्षा का जल अपने भीतर समाहित कर लेता है, अर्थात् वह दूसरों के गुणों को स्वीकार करने वाला है।

इस श्लोक का आशय यह है कि मनुष्य को अपनी विनम्र स्थिति पर दुखी नहीं होना चाहिए। यदि उसका हृदय उदार है और वह दूसरों के गुणों को अपनाता है, तो वही उसकी वास्तविक श्रेष्ठता है।

निष्कर्ष: इस श्लोक के माध्यम से कवि ने यह संदेश दिया है कि विनम्रता, उदारता और गुणग्राहकता ही सच्ची महानता है; अतः बाहरी स्थिति के कारण कभी हीनभावना नहीं रखनी चाहिए।
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