Question:medium

सप्रसंग व्याख्या सहित प्रस्तुत करें 
पूस जाड़ थरथर तन काँपा~। सूरज जराइ लंक दिसि तापा~॥ 
बिरह बाड़ि भा दारुन सीउ~। काँपि काँपि मरौं लोहि हरि जीउ~॥ 
कंत कहाँ हौं लागौं हियरे~। पंथ अपार सूझ नहीं नियरे~॥ 
सौर सुपीति आवे जुड़ी~। जानहूँ सेज हिंगांचल बूड़ी~॥

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‘सर्दी’, ‘काँपना’, ‘काँटे’, ‘हिमांचल’ जैसे प्रतीक गहन आध्यात्मिक अर्थ देते हैं — इन्हें केवल प्रकृति वर्णन न मानें।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

सन्दर्भ:
यह पद्यांश एक संत या भक्त कवि द्वारा रचित एक वर्णनात्मक दृश्य है, जो अत्यंत कठोर ऋतु और कठिन मार्ग का प्रतीकात्मक वर्णन करता है। यह पद आत्मा की ईश्वर-प्राप्ति की यात्रा को दर्शाता है।
प्रसंग:
कवि मनुष्य जीवन के मार्ग को कठिन और कष्टदायक बताते हुए ईश्वर की प्राप्ति के लिए आवश्यक तप, सहनशीलता और धैर्य का चित्रण करता है।
व्याख्या:
कवि कहता है कि पूस की सर्दी में शरीर कांप रहा है, सूर्य की गरमी भी ठंडी महसूस हो रही है।
विरह के कारण मन भी कांप रहा है और आत्मा थरथरा रही है, मानो ईश्वर से दूर होने का दुःख जीवन को कंपकंपा रहा हो।
हृदय में कांटे चुभ रहे हैं, रास्ता कठिन और अस्पष्ट है, कोई मार्गदर्शन उपलब्ध नहीं है।
सच्चा पथिक वही है जो ऐसी ठंडी रातों में हिमाचल की ओर तीव्र गति से जाता है, जहाँ उसे सत्य की सेज मिलेगी।
यह यात्रा आत्म-साक्षात्कार और ईश्वर के मिलन का प्रतीक है, जो त्याग, प्रेम और तप से संभव है।
निष्कर्ष:
यह काव्यांश आध्यात्मिक साधना के मार्ग की कठिनाइयों को दर्शाता है, जिसमें विरह, तपस्या और आत्मबल की आवश्यकता होती है। यह भक्तिकाल की तपश्चर्या और प्रेम का सुंदर चित्रण है।
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