Question:medium

निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : 
भूपति मरन पेप मनु राखी। जननी कुमति जगत् सबु साखी॥ 
देखि न जाहिं बिकल महतारी। जरौं दुसह जर पुर नर नारी॥ 
महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहितौं सब सूला॥ 
सुनि बन गवन कीन्ह रघुनाथा। करी मुनि बेष लखन सिय साथा॥ 
बिनु पानिहिं प्याओदेहि पाएँ। संकर साधि रहें एहि धाएँ॥ 
बहिरी निहारी निपट सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेंहू॥ 
अब सुभ आँगिनि देखहुँ आई। जियत जीव जड़ सबद सहाई॥ 
जिन्हहि निरिखि मग साँपिनि बीन्ही। तिनहि बिपम बिषु तापस तीन्ही॥ 
तेर रघुनंदन लखन सिय अनाथ लगै जाहि। 
तासु तनय तीज दुसह दुख देइ सनेस कहि॥

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सप्रसंग व्याख्या में पात्रों की मनःस्थिति, भाव-प्रवाह और सामाजिक संकेतों को एक सूत्र में जोड़कर स्पष्ट करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

प्रसंग: यह काव्यांश रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड से लिया गया है। यह प्रसंग राम के वनवास के दौरान अरण्य की स्त्रियों द्वारा व्यक्त भावनाओं का वर्णन करता है। यह उस समय का दृश्य है जब वे राम के वन में आगमन और सीता के अपहरण की खबर सुनकर दुखी होती हैं। तुलसीदास जी ने यहाँ स्त्रियों की करुणा, सामाजिक दृष्टिकोण, और नारीवादी विचारों को भावनात्मक रूप से प्रस्तुत किया है।
व्याख्या: इन पंक्तियों में, स्त्रियाँ कहती हैं कि यदि कोई राजा अपने प्रेम के कारण मर जाए और एक माँ अपनी ही बेटी को दुःख दे, तो यह दुनिया के लिए शर्मनाक है। वे कहती हैं कि माता-पिता की पीड़ा देखकर हृदय दुखी होता है, स्त्रियाँ दुःख से जलती हैं, और यह संसार सभी बुराइयों का कारण बन गया है। वे राम की मर्यादा, लक्ष्मण की सेवा और सीता के प्रेम को देखकर भावुक हो जाती हैं। वे कहती हैं कि जो राम जैसे आदर्श व्यक्ति को भी अपमानित मानता है, वह मूर्ख होगा। अंत में, वे सीता से कहती हैं: हे जानकी! आपने रघुनन्दन जैसे प्रभु को छोड़कर दुःख उठाने का रास्ता चुना, तो हमें और क्या कहना चाहिए? यह दुःख असहनीय है।
निष्कर्ष: इस काव्यांश में स्त्रियों की सहानुभूति, सामाजिक समझ और स्त्री-उन्मुख दृष्टिकोण व्यक्त किया गया है। वे राम, सीता और लक्ष्मण के आदर्शों से प्रेरित होकर करुणा से भर जाती हैं और समाज के नैतिक पतन पर दुख व्यक्त करती हैं। तुलसीदास जी ने यहाँ स्त्रियों की सामूहिक संवेदना को बहुत ही प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है।
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