Question:medium

निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए: 
पुर्ज़े खोलकर फिर ठीक करना मशीन काम नहीं है, लोग सीखते भी हैं, सिखाते भी हैं, अनाड़ी के हाथ में चाहे घड़ी मत दो जो घड़ीसाज़ी का इम्तहान पास कर आया हो। उसे तो देखने दो। साथ ही यह भी समझा दो कि आपको स्वयं घड़ी देखना, साफ़ करना और सुधारना आता है कि नहीं। हमें तो धोखा होता है कि परदादा की घड़ी जेब में डाले फिरते हो, वह बंद हो गई है, तुम्हें न चाबी देना आता है न पुर्ज़े सुधारना तब भी दूसरों के हाथ नहीं लगाने देते इत्यादि।

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सप्रसंग व्याख्या करते समय यह दिखाना ज़रूरी होता है कि लेखक किस प्रतीक के माध्यम से समाज की किस समस्या को उजागर कर रहा है — और उसका दृष्टिकोण कितना स्पष्ट और धारदार है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

संदर्भ:
यह अंश हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना से लिया गया है। लेखक समाज की विसंगतियों, रूढ़िवादी सोच, और बौद्धिक जड़ता पर व्यंग्य करते हैं। यहाँ, वे परंपराओं के प्रति लोगों की अंधी श्रद्धा और विवेकहीन पालन पर कटाक्ष करते हैं।
प्रसंग:
इस गद्यांश में, लेखक परंपराओं की तुलना 'घड़ी' से करते हैं। वे इस बात पर व्यंग्य करते हैं कि लोग पुरानी बातों, विश्वासों, और परंपराओं को 'धरोहर' मानकर, भले ही वे अब बेकार हो चुकी हों, साथ लेकर चलते हैं।
व्याख्या:
लेखक एक बड़ी सामाजिक समस्या को व्यंग्यात्मक ढंग से प्रस्तुत करते हैं। उनका कहना है कि मशीन (यहाँ परंपरा) को चलाने, समझने और ठीक करने की कला आवश्यक है। कई सामाजिक परंपराएँ और रूढ़ियाँ ऐसी हैं जिन्हें रखने से कोई लाभ नहीं।
'घड़ी' उन पुरानी परंपराओं का प्रतीक है जिन्हें लोग पीढ़ी दर पीढ़ी ढोते आ रहे हैं, लेकिन जिन्हें न तो समझा गया है और न ही सुधारा गया है। लेखक कहते हैं कि यदि आप घड़ी (परंपरा) ठीक नहीं कर सकते, तो कम से कम सुधार करने वाले को मौका दें। लेकिन समस्या यह है कि लोग न तो बदलाव चाहते हैं और न ही दूसरों को ऐसा करने देते हैं।
यह मानसिकता सामाजिक जड़ता के साथ-साथ सुधार का विरोध भी है। लोग मानते हैं कि पूर्वजों की परंपराएँ श्रेष्ठ हैं, भले ही वे आज के समय में अप्रचलित हों। वे भावनात्मक रूप से उनसे जुड़े होते हैं, जिससे परिवर्तन उन्हें गलत लगता है।
इस गद्यांश का व्यंग्य इसलिए प्रभावी है क्योंकि यह हमें सोचने पर मजबूर करता है: क्या हम अपनी 'पुरखों की घड़ी' साथ लिए घूम रहे हैं, जो अब समय नहीं दिखाती? क्या हमें उसे ठीक करना आता है? क्या हम सुधार करने का साहस रखते हैं?
निष्कर्ष:
इस गद्यांश में, परसाई जी रूढ़िवादी मानसिकता की आलोचना करते हैं। वे कहते हैं कि यदि किसी विचार या परंपरा की उपयोगिता समाप्त हो गई है, तो उसे ढोना उचित नहीं है। आवश्यक है कि हम परंपराओं की घड़ी को परखें, सुधारें और जो अनुपयोगी हो चुकी हैं, उन्हें छोड़ दें। यही सच्चा सामाजिक विकास है।
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