विश्लेषण: हिंदी साहित्य के रीतिकाल में विभिन्न काव्यधाराएँ विकसित हुईं, जिनमें रीति-बद्ध, रीति-सिद्ध और रीतिमुक्त काव्य प्रमुख हैं।
रीतिमुक्त काव्यधारा के कवि वे माने जाते हैं जिन्होंने काव्यशास्त्रीय नियमों और अलंकारिक बंधनों से हटकर स्वच्छंद भावनाओं की अभिव्यक्ति की।
इन कवियों ने नायिका-भेद और शास्त्रीय बंधनों की अपेक्षा व्यक्तिगत अनुभूति, विरह, प्रेम और मानवीय संवेदनाओं को अधिक महत्व दिया।
रीतिमुक्त काव्य में कृत्रिमता की अपेक्षा भावनात्मक सच्चाई और आत्मानुभूति प्रमुख होती है।
भाषा सरल, मार्मिक और हृदयस्पर्शी होती है, जिसमें कवि का व्यक्तिगत प्रेम-विरह स्पष्ट झलकता है।
इस धारा के कवियों ने अलंकारों का प्रयोग तो किया, परंतु वे केवल सौंदर्य-वृद्धि के लिए थे, न कि शास्त्रीय प्रदर्शन के लिए।
घनानन्द इस धारा के प्रमुख कवि माने जाते हैं।
उनकी रचनाओं में विरह-व्यथा, प्रेम की तीव्रता और आत्मीय संवेदनाओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है।
इसी कारण उन्हें रीतिमुक्त काव्यधारा का प्रतिनिधि कवि माना जाता है।
निष्कर्ष: अतः ‘रीतिमुक्त’ काव्यधारा के प्रमुख कवि घनानन्द हैं।