विश्लेषण: प्रस्तुत पंक्ति “ज्यों आँखिनु सब देखियै, आँख न देखी जाँहि।” में कवि ने अत्यंत सूक्ष्म और कल्पनाशील भाव व्यक्त किया है।
यहाँ ‘ज्यों’ शब्द का प्रयोग उपमा सूचक अवश्य है, परंतु भाव केवल साधारण तुलना तक सीमित नहीं है।
कवि यह संकेत करता है कि जिस प्रकार आँख सब कुछ देखती है, परंतु स्वयं को नहीं देख पाती, उसी प्रकार कोई अन्य भाव या स्थिति है जिसकी ओर संकेत किया गया है।
अलंकार शास्त्र के अनुसार जब किसी वस्तु या स्थिति की कल्पना इस प्रकार की जाती है कि उसमें संभावित समानता या कल्पित भाव प्रकट हो, तब वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।
उत्प्रेक्षा में ‘मानो’, ‘ज्यों’, ‘जैसे’ आदि शब्दों के माध्यम से किसी वस्तु की कल्पनात्मक समानता व्यक्त की जाती है, जहाँ सीधी तुलना के बजाय संभावना या कल्पना का भाव अधिक प्रमुख होता है।
इस पंक्ति में आँख के उदाहरण द्वारा एक कल्पित स्थिति का बोध कराया गया है, जो उत्प्रेक्षा अलंकार की विशेषता है।
अतः यहाँ कल्पना और संभाव्यता का प्रधान भाव होने के कारण यह उत्प्रेक्षा अलंकार का उदाहरण है।
निष्कर्ष: उपर्युक्त पंक्ति में प्रयुक्त अलंकार उत्प्रेक्षा अलंकार है।