सन्दर्भ: ‘मुक्तिदूत’ एक प्रेरणात्मक खण्डकाव्य है, जिसमें देशभक्ति, त्याग और स्वतंत्रता-संग्राम की भावना का प्रभावशाली चित्रण किया गया है।
इसके पंचम सर्ग में राष्ट्रप्रेम, संघर्ष और बलिदान की भावना अपने चरम रूप में प्रकट होती है।
कथावस्तु (पंचम सर्ग): पंचम सर्ग में वीर नायक के अदम्य साहस और आत्मबल का सजीव चित्रण मिलता है।
वह देश की स्वतंत्रता के लिए अत्याचारों और कष्टों का सामना करता है, परन्तु उसके मन में भय या निराशा का कोई स्थान नहीं होता।
विदेशी शासन की कठोर नीतियों और दमन के बावजूद उसका संकल्प अडिग बना रहता है।
इस सर्ग में नायक के संघर्ष, कारावास और यातनाओं का वर्णन है।
शारीरिक पीड़ा सहते हुए भी वह अपने उद्देश्य से विचलित नहीं होता और राष्ट्र की मुक्ति को ही जीवन का परम लक्ष्य मानता है।
उसके त्याग और बलिदान से जनसमूह में नई चेतना जागृत होती है तथा लोग स्वतंत्रता के लिए प्रेरित होते हैं।
कवि ने इस सर्ग में वीरता, धैर्य और आत्मोत्सर्ग की भावना को अत्यंत ओजपूर्ण भाषा में व्यक्त किया है।
नायक का चरित्र एक आदर्श देशभक्त के रूप में उभरकर सामने आता है, जो अपने व्यक्तिगत सुख-दुःख की परवाह किए बिना राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानता है।
निष्कर्ष: पंचम सर्ग की कथावस्तु का सार यह है कि नायक अपने अटूट साहस और बलिदान के माध्यम से राष्ट्र-मुक्ति का संदेश देता है तथा जनता के हृदय में स्वतंत्रता और आत्मगौरव की ज्योति प्रज्वलित करता है।