Question:medium

निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : 
‘इस शहर में धूल 
धीरे-धीरे उड़ती है 
धीरे-धीरे चलते हैं लोग 
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे 
शाम धीरे-धीरे होती है 
यह धीरे-धीरे होना 
धीरे-धीरे की सामूहिक लय 
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को 
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है 
कि हिलता नहीं है कुछ भी 
कि जो चीज़ जहाँ थी 
वहीं पर रखी है 
कि गंगा वहीं है 
कि वहीं पर बंधी है नाव’’ 
 

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‘धीरे-धीरे’ की पुनरावृत्ति कविता में स्थायित्व और परिवर्तनहीनता के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त है। यह शैलीगत प्रयोग कविता को प्रभावशाली बनाता है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

संदर्भ:
यह काव्यांश समकालीन हिंदी कविता से लिया गया है। इसमें शहर के जीवन, उसकी गति, स्थिरता और सामाजिक संरचना का गहन विश्लेषण किया गया है। कवि शहर की एक विशिष्ट "धीमी गति" को उजागर करता है, जो वहाँ की जीवनशैली का अभिन्न अंग बन गई है।
प्रसंग:
कविता में, कवि 'धीरे-धीरे' के दोहराव के माध्यम से एक सामूहिक यांत्रिक लय चित्रित करता है, जो न केवल गतिविधियों को संचालित करता है, बल्कि स्थिरता भी बनाए रखता है। शहर एक पूर्वनिर्धारित तरीके से बंधा हुआ है।
व्याख्या:
कवि दर्शाते हैं कि शहर में धूल धीरे उड़ती है, लोग धीरे चलते हैं, घड़ियाँ धीरे बजती हैं, और शाम धीरे होती है। यह 'धीरे-धीरे होना' एक सामाजिक गति है जो ठहराव को जन्म देती है।
शहर की सामूहिक लय 'दृढ़ता' से बंधी है, मानो शहर ने समय को जकड़ लिया हो। यह स्थिति परिवर्तन का विरोध करती है, जहाँ कुछ नया नहीं होता है, सब कुछ यथावत रहता है।
कवि इसे इस तरह प्रकट करता है कि वहाँ 'गंगा' (प्रवाह, परिवर्तन) नहीं रही - केवल 'नाव' (स्थिरता) बंधी रह गई है। यह रूपक गति के भ्रम को दर्शाता है, जबकि वास्तविकता में ठहराव है।
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