निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
भारतेन्दु-मंडल की किसी सजीव स्मृति के प्रति मेरी कितनी उत्कंठा रही होगी, यह अनुमान करने की बात है। मैं नगर से बाहर रहता था। एक दिन बालकों की मंडली जोड़ी गई। जो चौधरी साहब के मकान से परिचित थे, वे अगुवा हुए। मील डेढ़ मील का सफर तय हुआ। पत्थर के एक बड़े मकान के सामने हम लोग जा खड़े हुए। नीचे का बरामदा खाली था। ऊपर का बरामदा सघन लताओं के जाल से आवृत्त था। बीच-बीच में खंबे और खुली जगह दिखाई पड़ती थी। उसी ओर देखने के लिए मुझसे कहा गया। कोई दिखाई न पड़ा। सड़क पर कई चक्कर लगे। कुछ देर पीछे एक लड़के ने ऊँगली से ऊपर की ओर इशारा किया। लता-प्रतान के बीच एक मूर्ति खड़ी दिखाई पड़ी। ....... बस, यही पहली झाँकी थी।
संदर्भ:
यह अंश लेखक की भारतेन्दु-मंडल से जुड़ी यादों को प्रस्तुत करता है। लेखक बचपन की उस तीव्र इच्छा को व्यक्त करता है जो भारतेन्दु हरिश्चंद्र को प्रत्यक्ष रूप से देखने की चाह से उपजी थी।
प्रसंग:
यह प्रसंग लेखक के बचपन की एक महत्वपूर्ण स्मृति से संबंधित है, जब वह साथियों के साथ भारतेन्दु जी से मिलने उनके घर गया था। उस समय उसे एक सजीव, किंतु रहस्यमयी झलक मिली, जो जीवन भर उसकी स्मृति में बनी रही।
व्याख्या:
लेखक भावुकता से उस दिन को याद करता है जब वह भारतेन्दु जी को देखने के लिए उत्सुक था। वह एक संवेदनशील बालक था, जिसकी साहित्यिक समझ विकसित हो रही थी। जिस 'मूर्ति' का वर्णन है, वह भारतेन्दु जैसे महान साहित्यकार की पहली सजीव छवि थी।
बरामदे में दिखाई देने वाली वह आकृति, जो लताओं के बीच से दिख रही थी, लेखक के लिए रहस्य, प्रेरणा और रोमांच का केंद्र बन गई। यह दृश्य बाल मन पर गहरा प्रभाव डालता है। यह झलक भारतेन्दु युग की धरोहर से जोड़ती है, जिसे लेखक ने स्वप्नवत देखा था।
निष्कर्ष:
यह अंश लेखक की साहित्यिक संवेदनशीलता, स्मृति की शक्ति और बचपन की जिज्ञासा को दर्शाता है। भारतेन्दु के व्यक्तित्व की पहली झलक उसके लिए एक दिव्य अनुभव थी। यह अनुभूति आज भी लेखक के मन में जीवित है।
सप्रसंग व्याख्या सहित प्रस्तुत करें
पूस जाड़ थरथर तन काँपा~। सूरज जराइ लंक दिसि तापा~॥
बिरह बाड़ि भा दारुन सीउ~। काँपि काँपि मरौं लोहि हरि जीउ~॥
कंत कहाँ हौं लागौं हियरे~। पंथ अपार सूझ नहीं नियरे~॥
सौर सुपीति आवे जुड़ी~। जानहूँ सेज हिंगांचल बूड़ी~॥
सप्रसंग व्याख्या सहित प्रस्तुत करें
यह मधु है -- स्वयं काल की मौना का युग-संचय,
यह गौरस -- जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय,
यह अंकुर -- फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय,
यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो~।
यह दीप अकेला, स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो~।
निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
भूपति मरन पेप मनु राखी। जननी कुमति जगत् सबु साखी॥
देखि न जाहिं बिकल महतारी। जरौं दुसह जर पुर नर नारी॥
महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहितौं सब सूला॥
सुनि बन गवन कीन्ह रघुनाथा। करी मुनि बेष लखन सिय साथा॥
बिनु पानिहिं प्याओदेहि पाएँ। संकर साधि रहें एहि धाएँ॥
बहिरी निहारी निपट सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेंहू॥
अब सुभ आँगिनि देखहुँ आई। जियत जीव जड़ सबद सहाई॥
जिन्हहि निरिखि मग साँपिनि बीन्ही। तिनहि बिपम बिषु तापस तीन्ही॥
तेर रघुनंदन लखन सिय अनाथ लगै जाहि।
तासु तनय तीज दुसह दुख देइ सनेस कहि॥
निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
ऊँचे टक्कर से गिरे
बड़े-बड़े पियाय पत्ते
कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो –
खिली हुई हवा आई, फिकी-सी आई, चली गई।
ऐसे, फुटपाथ पर चलते चलते चलते।
कल मैंने जाना कि वसंत आया।
और यह कैलेंडर से मालूम था
अमुक दिन अमुक बार मधुमहीने की होगी पंचमी
दफ़्तर में छुट्टी थी – यह था प्रमाण
और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था
कि दहक-दहक दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल
आम बौर आएँगे
रंग रस-गंध से लदे-फँदे दूर के विदेश के
वे नंदन-वन होंगे यशस्वी
मधुमस्त पिक भौर आदि अपना-अपना कृतित्व
अवश्य करके दिखाएँगे
यही नहीं जाना था कि आज के नगण्य दिन जानूँगा
जैसे मैंने जाना, कि वसंत आया।