निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
किंतु यह भ्रम है... यह बाढ़ नहीं, पानी में डूबे धान के खेत हैं। अगर हम थोड़ी सी हिम्मत बटोरकर गाँव के भीतर चलें, तब वे औरतें दिखाई देंगी जो एक पाँव में झुकी हुई धान के पौधे छप-छप पानी में रोप रही हैं; सुंदर, सुघड़, धूप में चमकमारती काली रंगत और सिरों पर चटाई के किश्तीनुमा हैट, जो फ़ोटो या फ़िल्मों में देखे हुए वियतनामी या चीनी औरतों की याद दिलाते हैं। ज़रा-सी आहट पाते ही वे एक साथ सिर उठाकर चौकी हुई निगाहों से हमें देखती हैं — बिल्कुल उन युवा हिरणियों की तरह, जिन्हें मैंने एक बार कान्हा के वन्यस्थल में देखा था। किंतु वे डरती नहीं, भागती नहीं, सिर्फ़ विस्मय से मुस्कराती हैं और फिर सिर झुकाकर अपने काम में डूब जाती हैं... यह सम्पूर्ण दृश्य इतना साफ़ और सजीव है — अपनी स्वच्छ मासूमियत में इतना संपूर्ण और शाश्वत — कि एक क्षण के लिए विश्वास नहीं होता।
सप्रसंग व्याख्या सहित प्रस्तुत करें
पूस जाड़ थरथर तन काँपा~। सूरज जराइ लंक दिसि तापा~॥
बिरह बाड़ि भा दारुन सीउ~। काँपि काँपि मरौं लोहि हरि जीउ~॥
कंत कहाँ हौं लागौं हियरे~। पंथ अपार सूझ नहीं नियरे~॥
सौर सुपीति आवे जुड़ी~। जानहूँ सेज हिंगांचल बूड़ी~॥
सप्रसंग व्याख्या सहित प्रस्तुत करें
यह मधु है -- स्वयं काल की मौना का युग-संचय,
यह गौरस -- जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय,
यह अंकुर -- फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय,
यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो~।
यह दीप अकेला, स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो~।
निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
भूपति मरन पेप मनु राखी। जननी कुमति जगत् सबु साखी॥
देखि न जाहिं बिकल महतारी। जरौं दुसह जर पुर नर नारी॥
महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहितौं सब सूला॥
सुनि बन गवन कीन्ह रघुनाथा। करी मुनि बेष लखन सिय साथा॥
बिनु पानिहिं प्याओदेहि पाएँ। संकर साधि रहें एहि धाएँ॥
बहिरी निहारी निपट सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेंहू॥
अब सुभ आँगिनि देखहुँ आई। जियत जीव जड़ सबद सहाई॥
जिन्हहि निरिखि मग साँपिनि बीन्ही। तिनहि बिपम बिषु तापस तीन्ही॥
तेर रघुनंदन लखन सिय अनाथ लगै जाहि।
तासु तनय तीज दुसह दुख देइ सनेस कहि॥
निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
ऊँचे टक्कर से गिरे
बड़े-बड़े पियाय पत्ते
कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो –
खिली हुई हवा आई, फिकी-सी आई, चली गई।
ऐसे, फुटपाथ पर चलते चलते चलते।
कल मैंने जाना कि वसंत आया।
और यह कैलेंडर से मालूम था
अमुक दिन अमुक बार मधुमहीने की होगी पंचमी
दफ़्तर में छुट्टी थी – यह था प्रमाण
और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था
कि दहक-दहक दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल
आम बौर आएँगे
रंग रस-गंध से लदे-फँदे दूर के विदेश के
वे नंदन-वन होंगे यशस्वी
मधुमस्त पिक भौर आदि अपना-अपना कृतित्व
अवश्य करके दिखाएँगे
यही नहीं जाना था कि आज के नगण्य दिन जानूँगा
जैसे मैंने जाना, कि वसंत आया।