Question:medium

निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : ‘‘कुटज के ये सुंदर फूल बहुत बुरे तो नहीं हैं । जो कालिदास के काम आया हो उसे ज़्यादा इज़्ज़त मिलनी चाहिए । मिली कम है । पर इज़्ज़त तो नसीब की बात है । रहीम को मैं बड़े आदर के साथ स्मरण करता हूँ । दरियादिल आदमी थे, पाया सो लुटाया । लेकिन दुनिया है कि मतलब से मतलब है, रस चूस लेती है, छिलका और गुठली फेंक देती है । सुना है, रस चूस लेने के बाद रहीम को भी फेंक दिया गया था । एक बादशाह ने आदर के साथ बुलाया, दूसरे ने फेंक दिया ! हुआ ही करता है । इससे रहीम का मोल घट नहीं जाता । उनकी फक्कड़ाना मस्ती कहीं गई नहीं । अच्छे-भले कद्रदान थे । लेकिन बड़े लोगों पर भी कभी-कभी ऐसी वितृष्णा सवार होती है कि गलती कर बैठते हैं । मन खराब रहा होगा, लोगों की बेरुखी और बेकददानी से मुरझा गए होंगे – ऐसी ही मनःस्थिति में उन्होंने बिचारे कुटज को भी एक चपत लगा दी ।’’ 
 

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इस गद्यांश को समझने के लिए 'कुटज' और 'रहीम' दोनों को प्रतीक रूप में देखना ज़रूरी है — एक प्रकृति का और दूसरा मनुष्यता का। इसमें समाज की स्वार्थी प्रवृत्ति की आलोचना भी छिपी है, साथ ही एक करुण मानवीय दृष्टिकोण भी।
Updated On: Jan 24, 2026
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Solution and Explanation

सप्रसंग व्याख्या:
यह गद्यांश “कुटज” पाठ से लिया गया है। यह निबंध एक वृक्ष, कुटज और उसके प्रतीकात्मक महत्व पर केंद्रित है। लेखक कुटज की सुंदरता, उपयोगिता और उपेक्षा पर प्रकाश डालता है।
लेखक का मानना है कि यदि कुटज जैसे फूल कालिदास के साहित्य में स्थान रखते हैं, तो उन्हें उचित सम्मान मिलना चाहिए। हालांकि, उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।
लेखक रहीम, एक दानी और उदार कवि का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। रहीम का जीवन भी 'कुटज' के समान रहा - उपयोग तक पूज्य, फिर उपेक्षित। रहीम के साथ जैसा व्यवहार हुआ, वैसा ही व्यवहार समाज अक्सर प्रकृति और साधारण लोगों के साथ करता है — पहले उनसे लाभ उठाता है, फिर उन्हें त्याग देता है।
अंत में, लेखक यह भी सुझाव देता है कि रहीम की कुटज के प्रति कटु टिप्पणी, कुटज की वास्तविक हीनता के बजाय, उनके मन की खिन्नता का परिणाम हो सकती है। यह मानवीय स्वभाव का एक हिस्सा है।
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