निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
यह जो मेरे सामने कुटज का लहराता पौधा खड़ा है वह नाम और रूप दोनों में अपनी अपराजेय जीवनी शक्ति की घोषणा कर रहा है। इसीलिए यह इतना आकर्षक है। नाम है कि हज़ारों वर्ष से जीता चला आ रहा है। कितने नाम और गए। दुनिया उनको भूल गई, वे दुनिया को भूल गए। मगर कुटज है कि संस्कृत की निरंतर स्फीतमान शब्द राशि में जो जमके बैठा, सो बैठा ही है। और रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारुण निःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से अधिक कटोरे पापजन की कारा में रूंधा अजात जलस्तोत्र से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।
सप्रसंग व्याख्या सहित प्रस्तुत करें
पूस जाड़ थरथर तन काँपा~। सूरज जराइ लंक दिसि तापा~॥
बिरह बाड़ि भा दारुन सीउ~। काँपि काँपि मरौं लोहि हरि जीउ~॥
कंत कहाँ हौं लागौं हियरे~। पंथ अपार सूझ नहीं नियरे~॥
सौर सुपीति आवे जुड़ी~। जानहूँ सेज हिंगांचल बूड़ी~॥
सप्रसंग व्याख्या सहित प्रस्तुत करें
यह मधु है -- स्वयं काल की मौना का युग-संचय,
यह गौरस -- जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय,
यह अंकुर -- फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय,
यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो~।
यह दीप अकेला, स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो~।
निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
भूपति मरन पेप मनु राखी। जननी कुमति जगत् सबु साखी॥
देखि न जाहिं बिकल महतारी। जरौं दुसह जर पुर नर नारी॥
महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहितौं सब सूला॥
सुनि बन गवन कीन्ह रघुनाथा। करी मुनि बेष लखन सिय साथा॥
बिनु पानिहिं प्याओदेहि पाएँ। संकर साधि रहें एहि धाएँ॥
बहिरी निहारी निपट सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेंहू॥
अब सुभ आँगिनि देखहुँ आई। जियत जीव जड़ सबद सहाई॥
जिन्हहि निरिखि मग साँपिनि बीन्ही। तिनहि बिपम बिषु तापस तीन्ही॥
तेर रघुनंदन लखन सिय अनाथ लगै जाहि।
तासु तनय तीज दुसह दुख देइ सनेस कहि॥
निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
ऊँचे टक्कर से गिरे
बड़े-बड़े पियाय पत्ते
कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो –
खिली हुई हवा आई, फिकी-सी आई, चली गई।
ऐसे, फुटपाथ पर चलते चलते चलते।
कल मैंने जाना कि वसंत आया।
और यह कैलेंडर से मालूम था
अमुक दिन अमुक बार मधुमहीने की होगी पंचमी
दफ़्तर में छुट्टी थी – यह था प्रमाण
और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था
कि दहक-दहक दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल
आम बौर आएँगे
रंग रस-गंध से लदे-फँदे दूर के विदेश के
वे नंदन-वन होंगे यशस्वी
मधुमस्त पिक भौर आदि अपना-अपना कृतित्व
अवश्य करके दिखाएँगे
यही नहीं जाना था कि आज के नगण्य दिन जानूँगा
जैसे मैंने जाना, कि वसंत आया।