Question:medium

निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
कुटज के ये सुंदर फूल बहुत बुरे तो नहीं हैं। जो कालिदास के काम आया हो उसे ज़्यादा इज़्ज़त मिलनी चाहिए। मिली कम है। पर इज़्ज़त तो नसीब की बात है। रहीम को मैं बड़े आदर के साथ स्मरण करता हूँ। दरियादिल आदमी थे, पाया सो लुटाया। लेकिन दुनिया है कि मतलब से मतलब है, रस चूस लेती है, छिलका और गुठली फेंक देती है। सुना है, रस चूस लेने के बाद रहीम को भी फेंक दिया था। एक बादशाह ने आदर के साथ बुलाया, दूसरे ने फेंक दिया। हुआ ही करता है। इससे रहीम का मोल घट नहीं जाता। उनकी फक्कड़ाना मस्ती कहीं गई नहीं। अच्छे-ख़ासे कद्रदान थे। लेकिन बड़े लोगों पर भी कभी-कभी विघ्नाश्रु सवार होते हैं कि गलती कर बैठते हैं। मन ख़राब हुआ होगा, लोगों की बेरुख़ी और बेक़द्री से सुबक गए होंगे – ऐसी ही मनःस्थिति में उन्होंने बेचारे कुटज को भी एक चपत लगा दी।

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सप्रसंग व्याख्या में प्रतीकों की पहचान करें — कुटज और रहीम यहाँ समाज की निष्ठुर प्रवृत्ति के शिकार हैं।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

यह अंश प्रसिद्ध लेखक रामचंद्र शुक्ल के निबंधों से लिया गया है, जिसमें उन्होंने हमीद और कुटज के प्रतीकों के माध्यम से समाज में नैतिक गिरावट, उपेक्षा और सतही दृष्टिकोण पर व्यंग्य किया है।
प्रसंग: लेखक कुटज के फूलों का उदाहरण देकर मनुष्यों की प्रवृत्तियों पर कटाक्ष करते हैं। यह उस स्थिति को दर्शाता है जब समाज प्रतिभा, सादगी और मूल्यों की अनदेखी करता है, चाहे वह रहीम जैसे दानशील कवि हों या कुटज जैसे फूल।
व्याख्या: कुटज एक सुंदर फूल है, लेकिन कम प्रसिद्ध। लेखक का कहना है कि यह फूल बुरा नहीं है, लेकिन इसे उचित सम्मान नहीं मिला। जैसे कालिदास के कार्यों को अधिक महत्व मिला, उसी प्रकार रहीम को कम। रहीम, जो एक सम्मानित और उदार व्यक्ति थे, उन्हें भी समाज ने नजरअंदाज कर दिया।
एक बादशाह ने उन्हें सम्मान दिया, लेकिन दूसरों ने उन्हें बेकार समझकर त्याग दिया। लेखक इस मानसिकता की आलोचना करते हैं कि दुनिया उपयोग के बाद त्याग देती है - चाहे वह व्यक्ति हो या फूल।
लेखक का मानना ​​है कि रहीम का मूल्य कभी कम नहीं होता, लेकिन लोग फक्कड़पन को मस्ती समझ लेते हैं, और अच्छे लोगों पर भी संदेह किया जाता है। इसी भावना में, लेखक ने निरीह कुटज को एक "चपत" लगाई - जो समाज की तुच्छ और विवेकहीन प्रतिक्रिया का प्रतीक है।
निष्कर्ष: यह अंश समाज में मूल्यहीनता और उपयोगितावादी प्रवृत्तियों पर व्यंग्य करता है। लेखक यह समझाने की कोशिश करते हैं कि जो चीज या व्यक्ति उपयोगी नहीं दिखता, उसे त्यागना उचित नहीं है - चाहे वह कुटज हो या रहीम।
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