Question:medium

निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए: 
हर की पौड़ी पर साँझ कुछ अलग रंग में उतरती है। दीया-बाती का समय या कह लो आरती की बेला। पाँच बजे जो फूलों के दोने एक-एक रुपए के बिक रहे थे, इस वक्त दो-दो के हो गए हैं। भक्तों को इससे कोई शिकायत नहीं। इतनी बड़ी-बड़ी मनोकामना लेकर आए हुए हैं। एक-दो रुपए का मुँह थोड़े ही देखना है। गंगा सभा के स्वयंसेवक खाकी वर्दी में मस्तेदी से घूम रहे हैं। वे सबको सीढ़ियों पर बैठने की प्रार्थना कर रहे हैं। शांत होकर बैठिए, आरती शुरू होने वाली है। कुछ भक्तों ने स्पेशल आरती बोल रखी है। स्पेशल आरती यानी एक सौ एक या एक सौ इक्यावन रुपए वाली। गंगा-तट पर हर छोटे-बड़े मंदिर पर लिखा है — ‘गंगा जी का प्राचीन मंदिर।’ पंडितगण आरती के इंतज़ाम में व्यस्त हैं। पीतल की नीलांजलि में सहस्त्र बातियाँ घी में भिगोकर रखी हुई हैं।

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सप्रसंग व्याख्या में वातावरण-चित्रण, भाव-व्यंजना और लेखक की अंतर्निहित आलोचना को एकत्रित करना उत्तर को प्रभावी बनाता है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

संदर्भ:
यह अंश एक रेखाचित्र या संस्मरण से लिया गया है जो लेखक द्वारा 'हर की पौड़ी' पर आरती के समय के दृश्य का वर्णन करता है। यह धार्मिक स्थल पर आडंबर, व्यवस्था और आस्था के बाज़ारीकरण को दर्शाता है।
प्रसंग:
लेखक सांध्य आरती के दौरान हर की पौड़ी पर उपस्थित भीड़, वातावरण, व्यापार और व्यवस्था का बारीकी से वर्णन करता है। वह दिखाता है कि कैसे श्रद्धा और भक्ति के इस स्थान में व्यावसायिकता और औपचारिकता हावी हो गई है।
व्याख्या:
गद्यांश की शुरुआत 'हर की पौड़ी पर साँझ कुछ अलग रंग में उतरती है' जैसे वर्णनात्मक वाक्य से होती है, जो वातावरण की सुंदरता को दर्शाता है। लेखक आरती के समय का वर्णन करता है, लेकिन यह व्यवस्थित प्रबंधन और व्यावसायिक दृष्टिकोण से संचालित हो रहा है।
फूलों के दोने, जो पहले 1 रुपये में बिकते थे, अब 2 रुपये के हो गए हैं, और भक्त बिना शिकायत के खरीदते हैं। इसका कारण है कि वे बड़ी मनोकामनाओं के साथ आए हैं, और उनके लिए 2 रुपये मायने नहीं रखते। यह भक्तों की आस्था को दर्शाता है और उनकी भावनाओं के दोहन को उजागर करता है।
गंगा सभा के स्वयंसेवक खाकी वर्दी में व्यवस्था बनाए रखते हैं, जो दर्शाता है कि धार्मिक स्थलों पर अनुशासन संस्थागत हो गया है। भक्तों से 'शांत होकर बैठने' का आग्रह, आरती का समय, पंडितों की व्यस्तता - यह सब मंदिर को 'ईवेंट स्थल' जैसा बनाता है।
'स्पेशल आरती' जैसी अवधारणाएँ, जिसमें 101 या 151 रुपये जैसी राशि तय होती है, भक्तिभाव का मूल्य निर्धारण जैसा लगता है। मंदिरों पर 'प्राचीन मंदिर' लिखना श्रद्धा को आकर्षित करने का एक प्रचार माध्यम बन गया है। अंततः 'नीलांजलि में सहस्त्र बातियाँ' भिगोना धार्मिक भव्यता का प्रतीक बन गया है।
लेखक स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि आस्था अब परंपरा या आत्मिक अनुभव से अधिक एक बाज़ार और आयोजन बन गई है।
निष्कर्ष:
यह अंश धार्मिक स्थलों पर बदलते वातावरण, श्रद्धा के व्यापार में बदलने और भक्ति की भव्यता पर केंद्रित है। लेखक का दृष्टिकोण आलोचनात्मक है। वह दिखाता है कि कैसे आधुनिक धार्मिक परंपराएँ एक व्यवस्थात्मक और बाज़ारी ढाँचा बन चुकी हैं, जहाँ सच्ची भावना गौण हो गई है।
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