Question:medium

निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : अगहन देवस घटा निसि बाढ़ी । दूभर दुख सो जाइ किमि काढी ॥ 
अब धनि देवस बिरह भा राती । जरै बिरह ज्यों दीपक बाती ॥ 
काँपा हिया जनावा सीऊ । तौ पै जाइ होइ सँग पीऊ ॥ 
घर घर चीर रचा सब काहूँ । मोर रूप रँग लै गा नाहू ॥ 
पलटि न बहुरा गा जो बिछोई । अबहूँ फिरै फिरै रँग सोई ॥ 
सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा । सुलगि सुलगि दगधै भै छारा ॥ 
यह दुख दगध न जानै कंतू । जोबन जनम करै भसमंतू ॥ 
पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग । 
सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग ॥

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सप्रसंग व्याख्या में भावों की गहराई को सामाजिक और आध्यात्मिक संदर्भ में जोड़कर स्पष्ट करें। मीरा के पदों में विरह, भक्ति और सामाजिक विडंबना का गहन समन्वय होता है — इसे रेखांकित करना महत्वपूर्ण होता है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

यह पद मीरा बाई द्वारा रचित है, जो गहन आध्यात्मिक प्रेम और विरह की भावना को व्यक्त करता है। इसमें उनकी भक्ति, पीड़ा और सामाजिक विडंबना के प्रति संवेदनशीलता झलकती है। प्रसंग:
मीरा बाई श्रीकृष्ण से विरह में व्याकुल हैं। यह पद उनकी उस मनोदशा का वर्णन करता है जब उनका हृदय भगवान के विरह में तड़प रहा है और वह अपनी स्थिति श्रीकृष्ण तक पहुँचाना चाहती हैं। व्याख्या:
मीरा कहती हैं कि अगहन मास की रातें लंबी हो गई हैं और विरह का दुःख इतना भारी है कि समय कैसे बीते, समझ नहीं आता।
उनके लिए अब दिन भी रात जैसे हो गए हैं क्योंकि उनका जीवन प्रेम-विरह की अग्नि में जल रहा है, जैसे दीपक की बाती जलती है
उनका हृदय कांप रहा है, और वह उस बंधन को दोष देती हैं — काश वह धागा ही टूट जाए जिससे प्रेम जुड़ा है, ताकि पीड़ा समाप्त हो।
वह समाज की विडंबना पर कटाक्ष करती हैं कि हर किसी ने अपने अनुसार प्रेम का रंग चुना है, पर मीरा के प्रेम का रंग किसी को नहीं मिला।
जो प्रेम का वस्त्र उन्होंने बिछाया था, वह वापस नहीं मिला — और अब तक वही प्रेम रंग उनके जीवन में घूम रहा है।
उनके हृदय में विरह की आग धधक रही है, और वह स्वयं भस्म होती जा रही हैं, लेकिन उनके प्रियतम इस दुःख को नहीं जानते।
अंत में वह भँवरे और कौवे को संदेशवाहक बनाकर श्रीकृष्ण से कहती हैं कि उनकी प्रेमिका तो विरह में जलकर मर गई — अब तो उसकी राख का धुआँ भी मुझ पर असर डाल रहा है
निष्कर्ष:
यह पद मीरा की आत्मा की पुकार है। यह भक्ति और प्रेम की चरम अवस्था को दर्शाता है, जहाँ सांसारिक वस्तुएँ, समय और समाज महत्वहीन लगते हैं। मीरा का यह विरह सामान्य प्रेम नहीं, बल्कि एक दिव्य आत्मसमर्पण का प्रतीक है।
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