Question:easy

गद्यांश: ईर्ष्या द्वेष से प्रेरित निंदा भी होती है, लेकिन इसमें वह मजा नहीं जो मिशनरी भाव से निंदा करने में आता है। इस प्रकार का निंदक बड़ा दुखी होता है। ईर्ष्या द्वेष से चौबीसों घंटे जलता है, और निंदा का जल छिड़क कर कुछ शान्ति अनुभव करता है। ऐसा निंदक बड़ा दयनीय होता है। अपनी अक्षमता से पीड़ित वह बेचारा दूसरे की सक्षमता के चांद को देखकर सारी रात श्वान जैसा भौंकता है। ईर्ष्या द्वेष से प्रेरित निंदा करनेवाले को कोई दंड देने की जरूरत नहीं है, वह निंदक बेचारा स्वयं दंडित होता है। आप चैन से सोइये और वह जलन के कारण सो नहीं पाता। उसे और क्या दण्ड चाहिए? निरन्तर अच्छे काम करते जाने से उसका दंड भी सख्त होता जाता है। जैसे एक कवि ने अच्छी कविता लिखी, ईर्ष्याग्रस्त निंदक को कष्ट होगा। अब अगर एक और अच्छी लिख दी, तो उसका कष्ट दुगुना हो जाएगा।
(v) ईर्ष्या द्वेष से प्रेरित निंदक किस कारण सो नहीं पाता?

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: प्रश्न का उत्तर:
निन्दक की नींद उसकी ईर्ष्या और द्वेष की आग उड़ा देती है।

चरण 2: गद्यांश का प्रमाण:
गद्यांश में कहा गया है कि आप चैन से सोइए और वह जलन के कारण सो नहीं पाता। ऐसा निन्दक अपनी कमजोरी से दुखी होता है और दूसरे की सफलता देखकर रात भर बेचैन रहता है। वह चाँद को देखकर भौंकने वाले कुत्ते जैसा हो जाता है। यही उसका स्वयं का दण्ड है।

निष्कर्ष:
जलन, अर्थात् ईर्ष्या-द्वेष, के कारण निन्दक सो नहीं पाता।
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