Question:medium

निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए : "अशोक-वृक्ष की पूजा इन्हीं गन्धर्वों और यक्षों की देन है। प्राचीन साहित्य में इस वृक्ष की पूजा के उत्सवों का बड़ा सरस वर्णन मिलता है। असल पूजा अशोक की नहीं, बल्कि उसके अधिष्ठाता कन्दर्प-देवता की होती थी। इसे 'मदनोत्सव' कहते थे। महाराज भोज के 'सरस्वती-कण्ठाभरण' से जान पड़ता है कि यह उत्सव त्रयोदशी के दिन होता था। 'मालविकाग्निमित्र' और 'रत्नावली' में इस उत्सव का बड़ा सरस-मनोहर वर्णन मिलता है। मैं जब अशोक के लाल स्तवकों को देखता हूँ, तो मुझे वह पुराना वातावरण प्रत्यक्ष दिखायी दे जाता है।" (i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए। (ii) अशोक-वृक्ष की पूजा किसकी देन है? (iii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए। (iv) 'मदनोत्सव' किसे कहते हैं? (v) 'सरस्वती-कण्ठाभरण' किसकी रचना है?

Updated On: Sep 23, 2026
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Solution and Explanation

संक्षिप्त समेकित उत्तर:
यह अंश अशोक-वृक्ष से जुड़ी प्राचीन उत्सव-परम्परा पर लिखे गये ललित निबन्ध से है। इसकी पूजा गन्धर्व-यक्षों की परम्परा से जुड़ी है और वास्तविक आराध्य कामदेव (कन्दर्प) थे, जिस कारण इसे मदनोत्सव कहा गया — भोजरचित 'सरस्वती-कण्ठाभरण' के अनुसार यह त्रयोदशी को मनाया जाता था। रेखांकित अंश में लेखक अशोक के फूलों को देखकर उसी प्राचीन उल्लास का स्मरण करता है, जिसका सरस वर्णन 'मालविकाग्निमित्र' व 'रत्नावली' नाटकों में मिलता है।
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