चरण 1: प्रसंग:
याज्ञवल्क्य संन्यास लेकर वन जाना चाहते थे। उन्होंने अपनी सम्पत्ति दोनों पत्नियों में बाँटनी चाही। तब विदुषी मैत्रेयी ने पूछा कि क्या धन से अमरता मिल सकती है। यह गद्यांश उसी प्रसंग का है, जो बृहदारण्यक उपनिषद् से लिया गया है। पाठ संस्कृत की पाठ्यपुस्तक में याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद के रूप में दिया है।
चरण 2: वाक्य-दर-वाक्य अनुवाद:
यथैवोपकरणवतां जीवनं तथैव ते जीवनं स्यात् = जैसा जीवन धन-साधनों वाले लोगों का होता है, ठीक वैसा ही तुम्हारा जीवन हो जाएगा।
अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन = लेकिन धन के द्वारा अमर होने की तो कोई आशा ही नहीं।
येनाहं नामृता स्याम् किमहं तेन कुर्याम् = जिससे मैं अमर न बनूँ, उसका मैं क्या करूँ?
यदेव भगवान् केवलममृतत्वसाधनं जानाति, तदेव मे ब्रूहि = हे भगवन्! आप केवल अमरत्व का जो साधन जानते हैं, वही मुझसे कहिए।
प्रिया नः सती त्वं प्रियं भाषसे = तुम हमारी प्रिय हो और प्रिय बात ही बोल रही हो।
चरण 3: भावार्थ:
सच्ची जिज्ञासा वाला मनुष्य धन-वैभव से सन्तुष्ट नहीं होता। वह आत्मज्ञान और मोक्ष का मार्ग खोजता है। मैत्रेयी का यह उत्तर भारतीय नारी की ज्ञान-पिपासा को दिखाता है।
निष्कर्ष:
सन्दर्भ और पूरा हिन्दी अनुवाद ऊपर दिया गया है।