चरण 1: कथा का प्रसंग:
यह अंश संस्कृत दिग्दर्शिका के पाठ ‘जातक-कथा’ में आया है। पक्षियों की सभा उल्लू को अपना राजा बनाने जा रही है, तभी एक कौआ खड़ा होकर आपत्ति करता है। यही प्रसंग यहाँ दिया गया है।
चरण 2: अनुवाद (वाक्य के क्रम से):
1. इसके बाद एक पक्षी ने सबके भाव जानने के लिए सभा में तीन बार पुकारकर कहा।
2. तब एक कौआ उठा और बोला: रुको। राज्याभिषेक के इसी समय जब इसका चेहरा ऐसा है, तो क्रोधित होने पर कैसा दिखेगा?
3. इसकी क्रोधभरी दृष्टि पड़ते ही हम तप्त कड़ाही में डाले गए तिलों की भाँति वहीं-के-वहीं जल जाएँगे।
4. ऐसा राजा मुझे नहीं भाता, यह कहते हुए उसने कहा: तुम सबका भला हो, पर उल्लू का राज्याभिषेक मुझे ठीक नहीं लगता। जो अभी क्रोध में नहीं है, उसका मुँह देखो; क्रोध होने पर वह कैसा होगा?
चरण 3: कठिन शब्द:
अवलोकिताः = देखे गए। प्रक्षिप्ततिलाः = डाले गए तिल। इत्याह = ऐसा कहा। मह्यम् = मुझे। भद्रं वः = तुम सबका कल्याण हो।
चरण 4: सार:
कौआ बताता है कि भयानक स्वभाव वाला उल्लू राजा बनकर प्रजा को सताएगा, इसलिए उसे राजा नहीं बनाना चाहिए।