चरण 1: प्रसंग और स्रोत:
यह अंश ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के पाठ ‘महामना मालवीयः’ का है। इसमें एक लोकसेवी महापुरुष का परिचय दिया गया है, जिन्हें महामना कहा गया है। यह उपाधि पं. मदनमोहन मालवीय के लिए प्रसिद्ध है। लेखक ने उनके बहुमुखी व्यक्तित्व के साथ उनके सेवाभाव को दिखाया है।
चरण 2: पद-दर-पद अर्थ और अनुवाद:
महामना विद्वान् वक्ता, धार्मिको नेता, पटुः पत्रकारश्चासीत् = वे उदार हृदय के थे, ज्ञानी थे, अच्छे वक्ता थे, धर्म के नेता थे और चतुर पत्रकार भी थे।
परमस्य सर्वोच्चगुणः जनसेवैव आसीत् = उनका श्रेष्ठतम गुण लोगों की सेवा ही था।
यत्र कुत्रापि अयं जनान् दुःखितान् पीड्यमानांश्चापश्यत् = वे जहाँ भी लोगों को दुःखी और कष्ट पाते देखते थे,
तत्रैव सः शीघ्रमेव उपस्थितः सर्वविधं साहाय्यञ्च अकरोत् = वहीं तुरन्त पहुँचकर हर तरह की मदद करते थे।
प्राणिसेवा अस्य स्वभाव एवासीत् = जीवों की सेवा तो उनकी प्रकृति ही थी।
चरण 3: भावार्थ:
सच्चा बड़प्पन गुणों की गिनती में नहीं, दूसरों की पीड़ा दूर करने में है। यही सन्देश इस गद्यांश से मिलता है।
निष्कर्ष:
सन्दर्भ और हिन्दी अनुवाद ऊपर दिए गए हैं।