चरण 1: पाठ और प्रसंग:
पाठ का नाम ‘जातक-कथा’ है, जो ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ में संकलित है। यह बौद्ध जातक-साहित्य की कथा है। उलूक-जातक के इस प्रसंग में पक्षी अपने लिए राजा खोजते हैं।
चरण 2: मुख्य शब्द:
राजानमकुर्वन् = राजा बनाया। सन्निपत्य = मिलकर एकत्र होकर। प्रज्ञायते = जाना जाता है। अन्तरे = बीच में। राजस्थाने स्थापयितव्यः = राजा के पद पर बैठाना चाहिए। अवलोकयन्तः = देखते हुए। रोचते = अच्छा लगता है।
चरण 3: अनुवाद क्रम से:
पहले कल्प की बात है। मनुष्यों ने अपना राजा एक रूपवान, सौभाग्यशाली और सर्वगुणसम्पन्न व्यक्ति को बनाया। चार पैरों वाले जानवरों ने एक शेर को राजा बनाया। इसके बाद हिमालय की एक शिला पर पक्षी इकट्ठे हुए। उन्होंने कहा कि मनुष्यों में और चौपायों में राजा दिखाई देता है, पर हमारे भीतर राजा नहीं है। राजा के बिना रहना उचित नहीं। इसलिए किसी एक को राजा के स्थान पर स्थापित करें। तब वे आपस में देखने लगे, एक उल्लू पर उनकी दृष्टि पड़ी और बोले: हमें यही पसन्द है।
चरण 4: भावार्थ:
समाज चाहे किसी का हो, उसे व्यवस्था के लिए एक शासक चाहिए। यही बात इस अंश से समझ में आती है।