चरण 1: पाठ का परिचय:
यह अंश ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ (कक्षा 12) के पाठ ‘महामना मालवीयः’ का है। पाठ में मालवीय जी के व्यक्तित्व और उनकी लोकसेवा की चर्चा की गई है।
चरण 2: अनुवाद (वाक्य के क्रम से):
1. उदार हृदय वाले मालवीय जी ज्ञानी थे, अच्छे भाषण देने वाले थे, धर्म के नेता थे और चतुर पत्रकार भी थे।
2. उनकी सबसे बड़ी विशेषता लोगों की सेवा ही थी।
3. वे जिस किसी स्थान पर लोगों को कष्ट में और सताए जाते देखते, वहीं तुरन्त पहुँचकर हर तरह से मदद करते थे।
4. जीवों की सेवा करना उनका सहज स्वभाव था।
5. आज भी वे हमें सही रास्ता दिखाते हुए जगह-जगह और हर व्यक्ति में विद्यमान हैं।
6. श्लोक: जनसेवा को समर्पित वे महान पुण्यशाली लोग जयवन्त होते हैं, जिनके कीर्तिरूपी शरीर को कभी बुढ़ापे या मृत्यु का डर नहीं सताता।
चरण 3: कठिन शब्द:
यत्र कुत्रापि = जहाँ कहीं भी। तत्रैव = वहीं। परायणाः = लगे हुए। क्वचित् = कभी, कहीं।
चरण 4: सार:
मालवीय जी में विद्वत्ता के साथ सेवा-भाव भी था। इसी कारण उनका यश आज भी जीवित है।