चरण 1: प्रसंग:
लेखक संस्कृत भाषा का महत्त्व बता रहा है। वह कहता है कि जिस भाषा में वाल्मीकि, व्यास और कालिदास जैसे कवि हुए, वह हमारे लिए माँ के समान पूजनीय है। यह अंश ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के पाठ ‘संस्कृतभाषायाः महत्त्वम्’ का है और यहाँ पहले गद्यांश का उत्तर दिया जा रहा है।
चरण 2: वाक्य के अनुसार अनुवाद:
संस्कृत साहित्य के पहले कवि वाल्मीकि, महर्षि व्यास और कविकुल के गुरु कालिदास, साथ ही भास, भारवि, भवभूति आदि महाकवि अपनी रचनाओं के कारण आज भी पाठकों के मन में बसे हुए हैं।
यह भाषा हमारे लिए माता के तुल्य आदरणीय और वन्दनीय है। कारण यह है कि भारतमाता की आज़ादी, गौरव, अखण्डता और सांस्कृतिक एकता संस्कृत के द्वारा ही सुरक्षित रह सकती है।
संस्कृत भाषा सभी भाषाओं में प्राचीनतम और उत्तम है। इसी कारण यह उक्ति सही है कि भाषाओं में प्रधान, मधुर और दिव्य भाषा गीर्वाणभारती है।
चरण 3: कठिन शब्द:
स्वकीयैः = अपने
हृदि = हृदय में
सुष्ठूक्तम् = ठीक कहा गया
गीर्वाणभारती = देवताओं की वाणी
निष्कर्ष:
पूरा अनुवाद और सन्दर्भ ऊपर दिया गया है।