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‘नयन न तिरिपत भेल’ के आधार पर विद्यापति की नायिका की मनोदशा स्पष्ट कीजिए। 
 

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विद्यापति की नायिका शारीरिक सौंदर्य नहीं, आत्मिक प्रेम का प्रतीक है — उसकी पीड़ा, उसका तप बन जाती है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

'नयन न तिरिपत भेल' विद्यापति की एक प्रसिद्ध पदावली है, जो विरहिणी नायिका की गहन भावनाओं को व्यक्त करती है। यह मैथिली साहित्य में श्रृंगार रस की चरम सीमा को दर्शाती है।
नायिका बताती है कि उसके नेत्र कृष्ण के दर्शन से तृप्त नहीं हुए हैं। उसका मन बेचैन है और सांसारिक गतिविधियों में उसकी रुचि कम हो गई है। वह हर पल अपने प्रियतम से मिलने की तीव्र इच्छा रखती है।
भाव-चित्रण:
- वह बहुत भावुक और समर्पित है।
- उसकी पीड़ा गहरी है।
- वह केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक मिलन चाहती है।
- कृष्ण उसके लिए केवल प्रेमी नहीं, बल्कि उसकी चेतना का केंद्र हैं।
विद्यापति की नायिका व्यक्तिगत होते हुए भी सार्वभौमिक है। वह हर उस विरहिणी स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है जो प्रेम में पूर्ण समर्पण और अपूर्ण संतुष्टि के संघर्ष से गुजरती है।
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