कर्मवाच्य में कर्म प्रमुख होता है, और क्रिया कर्म के अनुसार बदलती है।
कर्मवाच्य वाक्य में, क्रिया का प्रभाव या ध्यान कर्म (क्रिया का विषय) पर केंद्रित होता है। इसका मतलब है कि कर्म वाक्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सकर्मक क्रिया वह है जिसका एक कर्म (वस्तु) होता है, यानी क्रिया का प्रभाव किसी व्यक्ति, वस्तु या चीज़ पर पड़ता है। उदाहरण के लिए, "राम ने किताब पढ़ी" में 'किताब' कर्म है, इसलिए यह सकर्मक क्रिया है।
इसलिए, कर्मवाच्य में क्रिया का सकर्मक होना ज़रूरी है क्योंकि क्रिया का प्रभाव कर्म पर पड़ता है, और यही क्रिया के अर्थ और दिशा को निर्धारित करता है। कर्मवाच्य में क्रिया का रूप भी कर्म के अनुसार बदलता है, जिससे वाक्य का अर्थ स्पष्ट होता है।
इस प्रकार, कर्मवाच्य वाक्य में कर्म की प्रधानता से क्रिया और वाक्य की संरचना स्पष्ट होती है, और भाषा अधिक प्रभावी बनती है।