विश्लेषण: रेखांकित अंश में लेखक ने तरुणों और वृद्धों की मानसिकता का अत्यंत सूक्ष्म और यथार्थ चित्रण किया है।
लेखक का आशय है कि जीवन के विभिन्न चरणों के अनुसार मनुष्य की सोच और दृष्टिकोण बदल जाता है।
तरुण अवस्था उत्साह, ऊर्जा और आकांक्षाओं से भरी होती है।
युवाओं के सामने जीवन का लंबा भविष्य होता है, इसलिए वे आने वाले समय को उज्ज्वल, आशाजनक और संभावनाओं से परिपूर्ण मानते हैं।
वे वर्तमान की सीमाओं से संतुष्ट नहीं रहते और समाज में परिवर्तन लाने के लिए उत्सुक रहते हैं।
इसी कारण तरुण क्रान्ति के समर्थक होते हैं, क्योंकि वे नई व्यवस्था, नए विचार और नए आदर्श स्थापित करना चाहते हैं।
इसके विपरीत वृद्धावस्था अनुभव, स्मृतियों और बीते हुए समय से जुड़ी होती है।
वृद्ध व्यक्ति अपने जीवन के स्वर्णिम क्षणों और अतीत के गौरव को स्मरण करते हैं, जो उन्हें सुखद प्रतीत होता है।
उनके लिए अतीत ही उज्ज्वल और आदर्श प्रतीत होता है।
वे परंपराओं, मूल्यों और सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा को आवश्यक मानते हैं, इसलिए उन्हें अतीत गौरव का संरक्षक कहा गया है।
इस प्रकार लेखक यह स्पष्ट करना चाहता है कि तरुण और वृद्ध दोनों की सोच में स्वाभाविक अंतर होता है।
युवक परिवर्तन और प्रगति के प्रतीक हैं, जबकि वृद्ध परंपरा और अनुभव के प्रतिनिधि हैं।
निष्कर्ष: अतः रेखांकित अंश का भाव यह है कि युवावस्था भविष्य की ओर उन्मुख होकर परिवर्तन चाहती है, जबकि वृद्धावस्था अतीत की महिमा को सुरक्षित रखना चाहती है।