Question:medium

इस शहर में धूल 
धीरे-धीरे उड़ती है 
धीरे-धीरे चलते हैं लोग 
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे 
शाम धीरे-धीरे होती है 
यह धीरे-धीरे होना 
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय 
दृढ़ता से बाँधे है सम्पूर्ण शहर को 
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है 
कि हिलता नहीं है कुछ भी 
कि जो चीज़ जहाँ थी 
वहीं पर रखी है 
कि गंगा वहीं है 
कि वहीं पर बँधी है नाव 
कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ 
सैनकों समय से 
 

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सप्रसंग व्याख्या में प्रसंग, आशय, भाषा-सौंदर्य और निष्कर्ष सभी को क्रम से और गहराई से जोड़ना चाहिए। इससे उत्तर संतुलित और मूल्यवान बनता है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

% प्रसंग प्रसंग:
यह पंक्तियाँ कवि केदारनाथ सिंह की कविता ‘इस शहर में धूल’ से उद्धृत हैं। कविता में, कवि बनारस शहर की जीवनशैली, गति, और सांस्कृतिक स्थिरता का सूक्ष्म चित्रण करते हैं। आधुनिक होते हुए भी, यह कविता पारंपरिक बनारसी जीवन की गहराई को दर्शाती है। यह बनारस की विशेषता, "धीरे-धीरे बहना और बदलते हुए भी न बदलना," को रूपक के माध्यम से प्रस्तुत करती है।
व्याख्या:
कविता में बार-बार आने वाला ‘धीरे-धीरे’ शब्द बनारस की आत्मा का प्रतीक है। यहाँ सब कुछ धीमी गति से होता है - धूल उड़ती है, लोग चलते हैं, घंटे बजते हैं, और शाम उतरती है। यह गति केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और सांस्कृतिक भी है।
यह ‘धीरे-धीरे’ होना एक सामूहिक लय का हिस्सा है, जो पूरे शहर को बांधे रखता है। कविता में यह भाव है कि शहर का ढांचा नहीं बदलता - गंगा वहीं है, नाव वहीं बंधी है, तुलसीदास की खड़ाऊँ उसी स्थान पर हैं। यह शहर की समय के प्रति अप्रभावित होने की भावना को उजागर करता है।
कवि ने बनारस की उस स्थिर चेतना को शब्दों में व्यक्त किया है जो जीवन के हर पहलू में व्याप्त है - एक ऐसी चेतना जो अडिग रहते हुए भी सब कुछ समाहित करती है।
निष्कर्षतः, यह कविता केवल बनारस का चित्रण नहीं करती, बल्कि भारतीय जीवन के उस पहलू को दर्शाती है जहाँ परंपरा और आधुनिकता एक अद्भुत संतुलन में सह-अस्तित्व में हैं। ‘धीरे-धीरे’ यहां शांति, गहराई और स्थिरता का प्रतीक है।
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