Question:medium

गद्यांश: ईर्ष्या द्वेष से प्रेरित निंदा भी होती है, लेकिन इसमें वह मजा नहीं जो मिशनरी भाव से निंदा करने में आता है। इस प्रकार का निंदक बड़ा दुखी होता है। ईर्ष्या द्वेष से चौबीसों घंटे जलता है, और निंदा का जल छिड़क कर कुछ शान्ति अनुभव करता है। ऐसा निंदक बड़ा दयनीय होता है। अपनी अक्षमता से पीड़ित वह बेचारा दूसरे की सक्षमता के चांद को देखकर सारी रात श्वान जैसा भौंकता है। ईर्ष्या द्वेष से प्रेरित निंदा करनेवाले को कोई दंड देने की जरूरत नहीं है, वह निंदक बेचारा स्वयं दंडित होता है। आप चैन से सोइये और वह जलन के कारण सो नहीं पाता। उसे और क्या दण्ड चाहिए? निरन्तर अच्छे काम करते जाने से उसका दंड भी सख्त होता जाता है। जैसे एक कवि ने अच्छी कविता लिखी, ईर्ष्याग्रस्त निंदक को कष्ट होगा। अब अगर एक और अच्छी लिख दी, तो उसका कष्ट दुगुना हो जाएगा।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: पाठ और रचनाकार:
यह पंक्ति हरिशंकर परसाई के व्यंग्य निबन्ध ‘निन्दा रस’ की है। परसाई जी ने इसमें निन्दा के अलग-अलग प्रकारों को हास्य और व्यंग्य के साथ समझाया है।

चरण 2: पूर्व-स्थिति:
निबन्ध के इस भाग में लेखक ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दक की बात कर रहे हैं। वह दूसरे के गुणों को देखकर रात-दिन जलता है और निन्दा करके थोड़ी राहत पाता है। इसी स्थिति में वे यह पंक्ति कहते हैं।

चरण 3: कठिन शब्दों के अर्थ:
निरन्तर: सदा चलते रहने वाला, लगातार।
दंड: कष्ट या सज़ा।
सख्त: कठोर, तीव्र।

चरण 4: भाव-विस्तार:
जब कोई व्यक्ति एक के बाद एक अच्छे काम करता जाता है, तो उसकी ख्याति बढ़ती है। यही बढ़ती ख्याति ईर्ष्यालु निन्दक के लिए दण्ड बन जाती है, क्योंकि वह दूसरे की प्रगति सह नहीं पाता। उसकी जलन पहले से ज़्यादा तीव्र होती जाती है और उसकी बेचैनी बढ़ती जाती है। लेखक ने कवि का उदाहरण देकर बात साफ़ की है कि पहली अच्छी कविता पर जितना कष्ट होगा, दूसरी पर उससे दुगुना होगा। अर्थात निन्दक को सज़ा देने का काम अच्छा काम करने वाला अनजाने में ही करता रहता है।

निष्कर्ष:
परसाई जी बताना चाहते हैं कि ईर्ष्यालु निन्दक अपने ही स्वभाव से दुखी रहता है। सज्जन व्यक्ति को उससे उलझने की जगह अपना अच्छा कार्य जारी रखना चाहिए।
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