Question:easy

गद्यांश: पृथ्वी और आकाश के अन्तराल में जो कुछ सामग्री भरी है, पृथ्वी के चारों ओर फैले हुए गम्भीर सागर में जो जलचर एवं रत्नों की राशियाँ हैं, उन सबके प्रति चेतना और स्वागत के नये भाव राष्ट्र में फैलने चाहिए। राष्ट्र के नवयुवकों के हृदय में उन सबके प्रति जिज्ञासा की नयी किरणें जब तक नहीं फूटतीं तब तक हम सोए हुए के समान हैं।
विज्ञान और उद्यम दोनों को मिलाकर राष्ट्र के भौतिक स्वरूप का एक नया ठाट खड़ा करना है। यह कार्य प्रसन्नता, उत्साह और अधक परिश्रम द्वारा नित्य आगे बढ़ाना चाहिए। हमारा यह ध्येय हो कि राष्ट्र में जितने हाथ है, उनमें से कोई भी इस कार्य में भाग लिये बिना रीता न रहे।
(i) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: पाठ और लेखक:
यह गद्यांश ‘राष्ट्र का स्वरूप’ नामक निबन्ध का अंश है, जो उत्तर प्रदेश बोर्ड की ‘सामान्य हिन्दी’ के गद्य भाग में पढ़ाया जाता है। इस निबन्ध के रचयिता वासुदेवशरण अग्रवाल हैं।

चरण 2: प्रसंग की झलक:
निबन्ध में लेखक ने भूमि, जन और संस्कृति को राष्ट्र के तीन आधार बताया है। उपर्युक्त पंक्तियों में वे भूमि से जुड़ी सम्पदा के ज्ञान और उपयोग पर बल देते हैं।

अंतिम उत्तर:
सन्दर्भ: निबन्ध ‘राष्ट्र का स्वरूप’, लेखक वासुदेवशरण अग्रवाल।
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