निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर लिखिए : "राष्ट्र का तीसरा अंग जन की संस्कृति है। मनुष्यों ने युगों-युगों में जिस सभ्यता का निर्माण किया है, वही उसके जीवन की श्वास-प्रश्वास है। बिना संस्कृति के जन की कल्पना कबन्धमात्र है, संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है। संस्कृति के विकास और अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि सम्भव है। राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जन के साथ-साथ जन की संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि भूमि और जन अपनी संस्कृति से विरहित कर दिये जायँ, तो राष्ट्र का लोप समझना चाहिए।" (i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए। (ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए। (iii) मनुष्य के जीवन की श्वास-प्रश्वास क्या है? (iv) राष्ट्र का लोप कब समझना चाहिए? (v) राष्ट्र की वृद्धि कैसे सम्भव है?