Question:medium

लागेउ माँह परे अब पाला~। बिरह काल भएउ जड़ काला~॥ 
पहिल पहिल तन रूई जो झाँपे~। रहिल रहिल अधिको हिय काँपे~॥ 
आई सूर होइ तपु रे नाहाँ~। तेहि बिनु जाड़ न छूटे माँहँ~॥ 
एहि मास उपजै रस मूलू~। तूँ सो भँवर मोर जोबन फूलू~॥

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“भँवरा और फूल” जैसे प्रतीकों का प्रयोग श्रृंगार काव्य की विशिष्ट शैली है — इन्हें केवल सौंदर्य वर्णन न मानें, इनमें गहरी पीड़ा निहित होती है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

सन्दर्भ:
यह पद्यांश रीतिकालीन काव्य परंपरा का है, जो नायिका के प्रेम-विरह और मनोदशा का मार्मिक चित्रण करता है।
प्रसंग:
यह पद नायिका की प्रिय से वियोग की स्थिति को दर्शाता है। ऋतु, शरीर और मन पर विरह का गहरा प्रभाव है।
व्याख्या:
नायिका प्रेम से मोहित है।
विरह का समय कठोर है, हृदय को शीत ऋतु की तरह ठिठुरा देता है।
शरीर कांप रहा है, यह प्रिय से बिछोह का कंपन है।
उसकी सहनशक्ति कम हो रही है, प्रियतम के बिना वह कष्ट सहन नहीं कर सकती।
यह वह मौसम है जिसमें प्रेम रस उत्पन्न होता है।
नायिका स्वयं को फूल और प्रिय को भँवरा कहती है, जो प्रेम के सौंदर्य को दर्शाता है।
निष्कर्ष:
यह काव्यांश विरह शृंगार का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें ऋतु, शरीर और प्रेम का गहरा संबंध है। नायिका की पीड़ा और प्रतीकात्मक भाषा भावपूर्ण चित्र बनाती है।
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