Concept:
- फ़िल्म एक साथ कला भी है और व्यापार भी। जब ये दोनों उद्देश्य टकराते हैं, तभी यह समस्या खड़ी होती है।
- इसी टकराव को क्रम से खोलने पर उत्तर पूरा बनता है।
Step 1: दोनों उद्देश्यों का अंतर बताइए।
व्यापारिक फ़िल्म का लक्ष्य है अधिक से अधिक टिकट बिकवाना। कलात्मक फ़िल्म का लक्ष्य है जीवन की सच्चाई और संवेदना को ईमानदारी से दिखाना।
दोनों के रास्ते अलग हो जाते हैं।
Step 2: दर्शक के स्तर पर टकराव देखिए।
सामान्य दर्शक फ़िल्म में मनोरंजन और चमक-दमक ढूँढ़ता है। ‘तीसरी कसम’ जैसी फ़िल्म उसे धीमी और गंभीर लगती है, इसलिए वह भीड़ नहीं जुटा पाती।
Step 3: बाजार के स्तर पर टकराव देखिए।
वितरक अपना पैसा जोखिम में नहीं डालना चाहता। जब उसे लगता है कि फ़िल्म भीड़ नहीं खींचेगी, तो वह उसे खरीदता ही नहीं। शैलेंद्र को इसी कठिनाई का सामना करना पड़ा था।
प्रचार और अच्छे सिनेमाघर भी इसी कारण नहीं मिलते।
Step 4: अंतिम विडंबना बताइए।
ऐसी फ़िल्में पुरस्कार जीतती हैं और वर्षों बाद सराही जाती हैं, पर अपने समय में घाटे में रहती हैं। ‘तीसरी कसम’ को राष्ट्रपति स्वर्ण पदक मिला, फिर भी वह व्यावसायिक रूप से असफल मानी गई।
Final Answer: कला और व्यापार के उद्देश्य अलग-अलग होने के कारण ऐसा होता है। दर्शक मनोरंजन चाहता है, वितरक जोखिम नहीं लेना चाहता, प्रचार नहीं मिलता, और इसी कारण उत्कृष्ट फ़िल्म भी कमाई की कसौटी पर पीछे रह जाती है।