चरण 1: प्रसंग:
पाठ ‘सुभाषितरत्नानि’ (संस्कृत दिग्दर्शिका, कक्षा 12) के इस सुभाषित में कवि कहता है कि सुख और विद्या साथ-साथ नहीं मिलते। विद्या के लिए तपस्या जैसा परिश्रम चाहिए।
चरण 2: अन्वय और पद-अर्थ:
सुखार्थिनः विद्या कुतः, विद्यार्थिनः सुखं कुतः। सुखार्थी विद्यां त्यजेत्, विद्यार्थी वा सुखं त्यजेत्।
सुखार्थी = आराम चाहने वाला। विद्यार्थी = पढ़ाई चाहने वाला। त्यजेत् = त्याग दे।
चरण 3: अनुवाद:
आराम पसन्द करने वाले को ज्ञान प्राप्त नहीं होता। ज्ञान के इच्छुक को आराम प्राप्त नहीं होता। इसलिए आराम की चाह रखने वाला पढ़ाई का विचार छोड़ दे, या पढ़ने वाला आराम की चाह छोड़ दे।
चरण 4: सार:
पढ़ाई में आलस्य, नींद और भोग-विलास बाधक हैं। जो विद्यार्थी इन्हें छोड़ देता है, वही सफल होता है।
निष्कर्ष:
इस उत्तर में श्लोक (सुखार्थिनः कुतो विद्या...) का सन्दर्भ सहित पूरा हिन्दी अनुवाद दिया गया है।