चरण 1: प्रसंग और पाठ का नाम:
यह पद्य ‘भोजस्यौदार्यम्’ नामक पाठ का है, जो बल्लाल कवि के ग्रन्थ ‘भोजप्रबन्ध’ पर आधारित है। कथा में एक कवि प्रातःकाल का वर्णन करके राजा भोज को प्रसन्न करता है और राजा उदारता से पुरस्कार देते हैं।
चरण 2: कठिन शब्द:
पिङ्गा = भूरे-पीले रंग की, रसपति = पारा (जो सोने के संयोग से पीला पड़ता है), प्राप्य = पाकर।
ग्राम्यसदः = मूर्खों की सभा, बुधजनः = ज्ञानी पुरुष।
नृपतयः = राजा लोग, अनुद्यमपराः = परिश्रम से दूर रहने वाले।
द्रविण = धन, गुणाः = गुण।
चरण 3: पंक्ति के क्रम से अनुवाद:
1. पूर्व दिशा सूर्य की सुनहरी आभा पाकर वैसे ही पीली हो गई जैसे पारा सोना पाकर पीला हो जाता है।
2. चन्द्रमा की चमक जाती रही, जैसे मूर्खों की सभा में विद्वान् की शोभा चली जाती है।
3. थोड़ी ही देर में तारे धुँधले हो गए, जैसे आलसी राजा अपना प्रभाव खो देते हैं।
4. दीपक अब नहीं चमकते, जैसे धनहीन लोगों के गुण कोई नहीं पूछता।
चरण 4: सार:
सूर्य के आते ही सभी छोटे प्रकाश-स्रोत फीके पड़ जाते हैं। कवि ने इसे उपमाओं के सहारे बहुत रोचक ढंग से कहा है।
निष्कर्ष:
इस श्लोक में प्रातःकाल का सजीव वर्णन है और अन्तिम पंक्ति में निर्धन के गुणों की उपेक्षा का सामाजिक सत्य भी कहा गया है।