चरण 1: श्लोक किस विषय का है:
यह सुभाषित संस्कृत की नीति-परम्परा का है और सज्जन तथा दुर्जन के आचरण का अन्तर बताता है। यह श्लोक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के पाठ ‘सुभाषितरत्नानि’ से लिया गया है।
चरण 2: पहले अर्थ समझें:
विद्या = पढ़ाई और ज्ञान, धनम् = सम्पत्ति, शक्तिः = बल। खल = दुर्जन, साधु = सज्जन। ज्ञानाय = जानने-समझने के लिए, दानाय = देने के लिए, रक्षणाय = बचाने के लिए।
चरण 3: पंक्ति के अनुसार अनुवाद:
पहली पंक्ति: दुर्जन के पास विद्या हो तो वह उसे विवाद में लगाता है, धन हो तो अभिमान करता है, बल हो तो दूसरों को पीड़ा देता है।
दूसरी पंक्ति: सज्जन का व्यवहार इसके ठीक उलटा है। वह विद्या से ज्ञान बाँटता है, धन से दान करता है और बल से रक्षा करता है।
चरण 4: तुलना तालिका के रूप में:
विद्या: दुर्जन के लिए विवाद, सज्जन के लिए ज्ञान।
धन: दुर्जन के लिए घमंड, सज्जन के लिए दान।
शक्ति: दुर्जन के लिए दूसरों को सताना, सज्जन के लिए रक्षा।
निष्कर्ष:
एक ही साधन दो स्वभाव वालों के हाथ में दो अलग फल देता है। इसलिए साधन से अधिक महत्त्व चरित्र का है।