चरण 1: स्रोत और प्रसंग:
पाठ ‘सुभाषितरत्नानि’ (संस्कृत दिग्दर्शिका, कक्षा 12) का यह श्लोक नीतिकार भर्तृहरि की रचना ‘नीतिशतक’ से लिया गया है। कवि यहाँ बताता है कि दृढ़ चरित्र वाले लोग किसी दबाव या लोभ से अपना मार्ग नहीं बदलते।
चरण 2: पद-विचार:
यदि वा = चाहे। गच्छतु = चली जाए। अद्य एव = आज ही। मरणम् अस्तु = मृत्यु हो। न्याय्यात् पथः = न्याय के रास्ते से। पदं न प्रविचलन्ति = पैर नहीं डिगाते।
चरण 3: अनुवाद (क्रम से):
चतुर नीतिज्ञ चाहे बुरा कहें या अच्छा कहें, चाहे लक्ष्मी घर में आकर बस जाए या जहाँ चाहे चली जाए, चाहे मौत इसी क्षण आ जाए या बहुत समय बाद आए, धैर्य वाले लोग सही रास्ते से अपना कदम नहीं हटाते।
चरण 4: सार:
निन्दा-प्रशंसा, धन का आना-जाना और मृत्यु का भय, ये तीनों धीर व्यक्ति को उसके उचित मार्ग से नहीं हिला पाते। यही उसकी सबसे बड़ी पहचान है।
निष्कर्ष:
इस उत्तर में श्लोक (निन्दन्तु नीतिनिपुणाः...) का सन्दर्भ सहित पूरा अनुवाद प्रस्तुत है।