चरण 1: प्रसंग:
पाठ ‘सुभाषितरत्नानि’ (संस्कृत दिग्दर्शिका, कक्षा 12) में यह सुभाषित विद्या की महिमा बताता है। लेखक विद्या-धन की तुलना साधारण धन से करके उसकी विशेषताएँ गिनाता है।
चरण 2: पदार्थ और अन्वय:
विद्या-धनं न चौरहार्यम्, न राजहार्यम्, न भ्रातृभाज्यम्, न च भारकारि। व्यये कृते नित्यं वर्धते एव। अतः सर्वधनप्रधानम् अस्ति।
भारकारि = भार पैदा करने वाला। नित्यम् = सदा।
चरण 3: अनुवाद:
विद्या ऐसा धन है जिसे चोर उठाकर नहीं ले जा सकता, राजा जब्त नहीं कर सकता, भाई हिस्सा बनाकर बाँट नहीं सकते और जिसे ढोने में कोई बोझ भी नहीं है। जितना इसे खर्च (दान) किया जाए, उतना यह हमेशा बढ़ता जाता है। इसीलिए यह सब प्रकार के धनों में सबसे ऊपर है।
चरण 4: सार:
धन के चार दोष हैं: चोरी, राजदण्ड, बँटवारा और बोझ। विद्या में ये चारों दोष नहीं हैं, और खर्च से उसकी वृद्धि भी होती है। इसलिए हमें विद्या अर्जित करनी चाहिए।
निष्कर्ष:
इस उत्तर में श्लोक (न चौरहार्यं न राजहार्यं...) का सन्दर्भ सहित पूरा अनुवाद दिया गया है।