चरण 1: चुना गया छन्द:
विकल्प में दोहा और कुण्डलिया हैं। इस समाधान में दूसरे छन्द 'कुण्डलिया' का उत्तर लिखा गया है।
चरण 2: लक्षण:
कुण्डलिया विषम मात्रिक छन्द है। इसमें एक दोहा और उसके बाद एक रोला जुड़ा रहता है, इसलिए कुल छह चरण बनते हैं। हर चरण में 24 मात्राएँ होती हैं।
दोहे का अंतिम चरण रोला के आरम्भ में दोहराया जाता है, और छन्द का पहला शब्द ही उसका अंतिम शब्द बनता है।
चरण 3: उदाहरण (गिरिधर कविराय):
दौलत पाय न कीजिए, सपनेहु अभिमान।
चंचल जल दिन चारिको, ठाउँ न रहत निदान॥
ठाउँ न रहत निदान, जियत जग में जस लीजै।
मीठे वचन सुनाय, बिनय सबही की कीजै॥
कह गिरिधर कविराय, अरे यह सब घट तौलत।
पाहुन निसिदिन चारि, रहत सबही के दौलत॥
चरण 4: पहचान:
दोहे के अंत का चरण 'ठाउँ न रहत निदान' रोला के आरम्भ में दोहराया गया है। छन्द 'दौलत' से शुरू होकर 'दौलत' पर ही समाप्त होता है। ये दोनों बातें कुण्डलिया की पहचान हैं।
अंतिम उत्तर:
कुण्डलिया दोहा और रोला के मेल से बना छह चरणों वाला मात्रिक छन्द है।