चरण 1: श्लोक का परिचय:
यह पद्य ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के पाठ ‘जातक-कथा’ में आई उलूक-जातक की कथा का है। कथा में पक्षी उल्लू को राजा बनाने की सोचते हैं और कौआ इसका विरोध करता है।
चरण 2: कथा-सन्दर्भ:
सभी पक्षी अपने लिए नया राजा चुनना चाहते थे। उन्होंने उल्लू को चुन लिया और उसके राज्याभिषेक की तैयारी होने लगी। उसी समय कौए ने आकर सबको रोका और अपनी असहमति इस श्लोक में प्रकट की।
चरण 3: पदों का अर्थ:
भद्रम् = मंगल। वः = तुम्हारा। न रोचते = रुचिकर नहीं है। अभिषेचनम् = राजतिलक। अक्रुद्ध = जो गुस्से में न हो। मुखम् = चेहरा।
चरण 4: क्रमबद्ध अनुवाद:
1. तुम सबका कल्याण हो, पर मुझे उल्लू का राजतिलक अच्छा नहीं लगता।
2. जरा इसका चेहरा तो देखो, यह क्रोध के बिना भी कितना कठोर है।
3. जब यह क्रोध करेगा तब कैसा हो जाएगा?
चरण 5: सार:
शान्त अवस्था में भी जो उग्र दिखाई देता है, उसे अधिकार देना उचित नहीं। शासक ऐसा होना चाहिए जिसे देखकर प्रजा को भय नहीं, विश्वास मिले।
निष्कर्ष:
इस श्लोक का सन्देश है कि किसी को बड़ा पद देने से पहले उसके स्वभाव की जाँच अवश्य करनी चाहिए।