विश्लेषण: प्रस्तुत पद्यांश भक्त कवि सूरदास द्वारा रचित है, जिसमें बालक कृष्ण की बाल-सुलभ चेष्टाओं का अत्यंत मनोहर चित्रण किया गया है।
इसमें कृष्ण अपनी माता यशोदा से शिकायत करते हुए कहते हैं कि वे गाय चराने नहीं जाएँगे।
रेखांकित पंक्ति — “सिगरे ग्वाल घिरावत मोसों, मेरे पाइ पिराइ।” — में कृष्ण कहते हैं कि सभी ग्वाल-बाल उन्हें चारों ओर से घेर लेते हैं, जिससे उनके पैरों में पीड़ा होती है।
यहाँ बालक कृष्ण की मासूमियत और शिकायत भरा स्वर प्रकट होता है।
वे अपनी असहजता और कष्ट को बढ़ा-चढ़ाकर माँ के सामने व्यक्त कर रहे हैं, ताकि वे उन्हें गाय चराने न भेजें।
दूसरी पंक्ति — “सूर स्याम मेरौ अति बालक, मारत ताहि रिंगाइ।” — में यशोदा कहती हैं कि मेरा श्याम (कृष्ण) तो बहुत छोटा बालक है, फिर भी ग्वाल-बाल उसे गिराकर मारते हैं।
यहाँ मातृ-स्नेह की गहन भावना व्यक्त हुई है।
यशोदा अपने पुत्र के प्रति अत्यधिक स्नेह और संरक्षण की भावना रखती हैं तथा दूसरों पर क्रोधित हो उठती हैं।
इन पंक्तियों में बाल-कृष्ण की चंचलता, सरलता और मातृ-स्नेह का अत्यंत कोमल एवं सजीव चित्रण हुआ है।
भाषा ब्रजभाषा की मधुरता से परिपूर्ण है और भाव अत्यंत मार्मिक एवं सरस हैं।
निष्कर्ष: रेखांकित अंश में बालक कृष्ण की शिकायत भरी सरल वाणी तथा माता यशोदा के वात्सल्य भाव का सुंदर और हृदयस्पर्शी चित्रण किया गया है।