संक्षिप्त समेकित उत्तर:
यह रीतिकालीन कवि की रचना है, जिसमें यमुना-जल में चन्द्र-प्रतिबिम्ब के चंचल हिलने-डुलने का बहुविध कल्पनाशील चित्रण किया गया है — कभी वह प्रेमी-सा लोटता, कभी झूला झूलता, कभी पतंग-सा उड़ता, कभी स्नान करती ब्रज-रमणी-सा प्रतीत होता है। 'मनु' शब्द के प्रयोग से यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार सिद्ध होता है। 'बालगुड़ी' छोटी पतंग और 'हिंडोरनि' झूले के अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं, तथा 'अवगाहन' का पर्यायवाची शब्द 'स्नान' है।