यह उद्धरण ‘सूरदास की झोंपड़ी’ पाठ से लिया गया है, जो ग्रामीण समाज की जातिगत, राजनीतिक और सामाजिक संरचना को उजागर करता है। बिसनाथ एक सीधा-सादा, परिश्रमी, आत्मनिर्भर और ईमानदार दूध विक्रेता है। वह गायें पालता है और ईमानदारी से दूध बेचकर जीवन यापन करता है। उसकी कोई राजनीतिक या सामाजिक पहुंच नहीं है, और वह सत्ता से डरने वाला नहीं, बल्कि सचेत और सत्यवादी नागरिक है।
जब गाँव के प्रधान और अन्य सत्ताधारी सूरदास की झोंपड़ी को हटाने की योजना बनाते हैं, तो बिसनाथ इसका विरोध करता है और झोंपड़ी का समर्थन करता है। यह बात सत्ता में बैठे लोगों को अच्छी नहीं लगती। वे बिसनाथ को सबक सिखाने के लिए उस पर एक सामाजिक आरोप लगाते हैं — कि वह ‘दूध कटहा’ है, जिसका अर्थ है कि उसके कारण दूध खराब हो जाता है।
ग्रामीण समाज में ‘दूध कटहा’ कहना सामाजिक बहिष्कार के समान है। यह आरोप बिना किसी सबूत के लगाया गया, लेकिन समाज ने बिना सोचे-समझे इसे मान लिया। परिणामस्वरूप, लोग बिसनाथ से दूध खरीदना बंद कर देते हैं और उसकी आजीविका खतरे में पड़ जाती है।
यह संकट केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक अपमान, पहचान का हनन और लाचारी का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि एक साधारण व्यक्ति कैसे सत्ता की चालों का शिकार बनता है, और समाज कितनी जल्दी अफवाहों और सामाजिक मान्यताओं पर विश्वास कर लेता है।
इस उद्धरण के अनुसार, बिसनाथ के प्रति मेरे मन में गहरा दुख, सम्मान और चिंता का भाव उत्पन्न होता है। वह सच्चाई और न्याय के पक्ष में खड़ा होता है, लेकिन उसे सामाजिक बहिष्कार और आजीविका से वंचित होने का परिणाम मिलता है। बिसनाथ आधुनिक भारतीय समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधि है जो सच बोलने की सज़ा भुगतता है।