चरण 1: निबन्ध की योजना:
अन्नदाता और देश की भूख
अकाल से आत्मनिर्भरता तक
हरित और श्वेत क्रान्ति
सरकारी प्रयास
चुनौतियाँ
आगे का मार्ग
चरण 2: निबन्ध, भारत में कृषि-क्रान्ति:
भूमिका:
किसान देश का अन्नदाता है। उसकी मेहनत से ही करोड़ों लोगों की थाली भरती है। एक समय ऐसा था जब भारत को अनाज विदेश से मँगाना पड़ता था। आज वही देश अपनी जरूरत पूरी करके दूसरों को भी अनाज भेजता है। यह बदलाव कृषि-क्रान्ति की देन है।
अकाल से आत्मनिर्भरता तक:
आजादी के बाद कुछ वर्षों तक खेती पुरानी पद्धति पर चलती रही। हल-बैल, कम उपज वाले बीज और वर्षा का सहारा, यही किसान की पूँजी थी। सूखा पड़ते ही अनाज का संकट खड़ा हो जाता था। सन् 1960 के दशक में वैज्ञानिकों और सरकार ने मिलकर नई राह अपनाई।
हरित और श्वेत क्रान्ति:
बौने और उन्नत किस्म के गेहूँ-धान के बीज, खाद और सिंचाई ने हरित क्रान्ति को जन्म दिया। इसके बाद डॉ. वर्गीज कुरियन के प्रयासों से दूध का उत्पादन बढ़ा और भारत विश्व के बड़े दूध उत्पादक देशों में गिना जाने लगा। इन दोनों क्रान्तियों ने गाँव की अर्थव्यवस्था को नई शक्ति दी।
सरकारी प्रयास:
सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद, किसान क्रेडिट कार्ड, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, फसल बीमा और पीएम-किसान सम्मान निधि जैसी योजनाएँ चलाईं। इनसे किसान को आर्थिक सुरक्षा और खेती के लिए पूँजी मिली। कृषि विश्वविद्यालय और अनुसंधान संस्थान नई किस्में तैयार करते हैं।
चुनौतियाँ:
आज छोटी जोतें, महँगी खाद, गिरता भूजल, मौसम की मार और उपज का उचित दाम न मिलना बड़ी चुनौतियाँ हैं। अधिक रसायन से मिट्टी थक रही है और पानी प्रदूषित हो रहा है।
आगे का मार्ग:
अब जैविक और प्राकृतिक खेती, कम पानी वाली सिंचाई, भण्डारण और प्रसंस्करण उद्योग, तथा किसान को सीधे बाजार से जोड़ने की जरूरत है। ऐसा होने पर खेती लाभ का काम बनेगी और युवा भी उससे जुड़ेंगे।
उपसंहार:
कृषि-क्रान्ति भारत की बड़ी सफलता है, पर यह यात्रा अधूरी है। धरती और किसान, दोनों का ध्यान रखकर ही हम दूसरी हरित क्रान्ति की ओर बढ़ सकते हैं।
निष्कर्ष:
सुखी किसान और स्वस्थ धरती ही समृद्ध भारत की पहचान होंगे।