चरण 1: निबन्ध का ढाँचा:
1. भूमिका
2. भारतीय संस्कृति में प्रकृति का स्थान
3. पर्यावरण बिगड़ने के कारण
4. संकट के रूप और परिणाम
5. हम क्या कर सकते हैं
6. समापन
चरण 2: निबन्ध: पर्यावरण-संरक्षण, आज की पुकार:
भूमिका: मनुष्य ने विज्ञान के बल पर बहुत उन्नति की है, पर इस उन्नति की कीमत प्रकृति ने चुकाई है। नदियाँ मैली हो गई हैं, हवा विषैली हो गई है और वन घटते जा रहे हैं। यदि पर्यावरण नहीं बचा, तो मनुष्य भी नहीं बचेगा।
भारतीय संस्कृति में प्रकृति का स्थान: हमारे यहाँ नदी को माता, पृथ्वी को माँ और वृक्ष को देवता माना गया है। वेदों में सूर्य, वायु, जल और अग्नि की स्तुति है। हमारे पूर्वज प्रकृति के साथ मिलकर जीते थे, इसीलिए वह संतुलन बना रहा।
पर्यावरण बिगड़ने के कारण: जनसंख्या बढ़ने से संसाधनों पर भार पड़ा है। उद्योगों की चिमनियाँ धुआँ उगलती हैं और उनका रासायनिक कचरा नदियों में जाता है। सड़कों पर वाहनों की भीड़ है। खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का अधिक उपयोग मिट्टी को बंजर बना रहा है। प्लास्टिक का कचरा भी बड़ी समस्या है।
संकट के रूप और परिणाम: बड़े शहरों में साँस लेना कठिन हो गया है और कई बार वायु की गुणवत्ता खतरनाक स्तर तक पहुँच जाती है। पीने योग्य जल घट रहा है। तापमान बढ़ने से कहीं सूखा है तो कहीं बाढ़। अनेक पशु-पक्षी और वनस्पतियाँ लुप्त होने के कगार पर हैं।
हम क्या कर सकते हैं: हर व्यक्ति अपने जीवन में छोटे-छोटे बदलाव कर सकता है। पौधे लगाए, बिजली और पानी बचाए, पॉलीथिन का प्रयोग छोड़े और निकट की दूरी पैदल या साइकिल से तय करे। कचरा गीला और सूखा अलग-अलग रखे। सरकार को कठोर कानून बनाकर प्रदूषण फैलाने वालों को दंडित करना चाहिए। विद्यालयों में पर्यावरण की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।
समापन: प्रकृति हमें बिना माँगे सब कुछ देती है, बदले में हमें उसकी रक्षा करनी चाहिए। आज लिया गया छोटा-सा संकल्प भी कल बड़ा परिवर्तन ला सकता है। आइए हम सब मिलकर अपनी धरती को हरा-भरा और स्वच्छ बनाएँ।
निष्कर्ष:
पर्यावरण की रक्षा में ही मानव जाति की रक्षा निहित है।