चरण 1: विषय का विवेचन और रूपरेखा:
विषय: पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता। निबन्ध में पहले मनुष्य और प्रकृति का सम्बन्ध, फिर प्रदूषण के रूप, उसकी हानियाँ, समाधान और अन्त में हमारा कर्तव्य लिखा जाएगा।
रूपरेखा: भूमिका, प्रकृति और मानव का नाता, प्रदूषण के चार रूप, हानियाँ, समाधान, हमारा कर्तव्य, उपसंहार।
चरण 2: निबन्ध:
भूमिका
जीवन के लिए शुद्ध हवा, स्वच्छ जल और उपजाऊ भूमि चाहिए। ये तीनों प्रकृति की देन हैं। जब प्रकृति का सन्तुलन बिगड़ता है, तो जीवन संकट में पड़ जाता है। आज यही संकट हमारे सामने खड़ा है, इसीलिए पर्यावरण की रक्षा अनिवार्य हो गई है।
प्रकृति और मानव का नाता
भारतीय संस्कृति में नदी, पर्वत, वृक्ष और धरती को माता-पिता के समान माना गया है। हमारे पूर्वज प्रकृति की पूजा करते थे और उसका उतना ही उपयोग करते थे, जितनी आवश्यकता होती थी। आधुनिक मनुष्य ने लोभ में आकर प्रकृति का अन्धाधुन्ध दोहन शुरू कर दिया।
प्रदूषण के रूप
वायु-प्रदूषण वाहनों और कारखानों के धुएँ से होता है। जल-प्रदूषण नदियों में गंदगी और रसायन बहाने से फैलता है। ध्वनि-प्रदूषण लाउडस्पीकर, हॉर्न और मशीनों के शोर से बढ़ता है। मृदा-प्रदूषण रासायनिक खाद, कीटनाशक और प्लास्टिक के कचरे से होता है।
हानियाँ
इन सबका असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। साँस, त्वचा और पेट के रोग बढ़ते हैं। शोर से नींद और एकाग्रता घटती है। धरती गर्म हो रही है, मौसम अनियमित हो गया है और खेती को नुकसान पहुँच रहा है।
समाधान
अधिक से अधिक पेड़ लगाए जाएँ और जंगलों की कटाई रोकी जाए। कचरे को अलग-अलग करके उसका पुनर्चक्रण किया जाए। जैविक खेती अपनाई जाए। कारखानों पर कड़ी निगरानी रखी जाए। बिजली की बचत की जाए और स्वच्छ ऊर्जा का प्रयोग बढ़ाया जाए। चिपको आन्दोलन जैसे जन-आन्दोलन हमें सिखाते हैं कि आम लोग भी वनों को बचा सकते हैं।
हमारा कर्तव्य
हर व्यक्ति अपने जन्मदिन या किसी शुभ अवसर पर एक पौधा लगाए और उसकी देखभाल करे। पानी की टोंटी खुली न छोड़े, प्लास्टिक की थैलियाँ न फेंके और पास की दूरी पैदल या साइकिल से तय करे। ऐसे छोटे प्रयास मिलकर बड़ा परिवर्तन लाते हैं।
उपसंहार
पर्यावरण बचेगा, तभी मनुष्य बचेगा। इसलिए विकास और प्रकृति के बीच सन्तुलन बनाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
निष्कर्ष:
स्वच्छ पर्यावरण के बिना स्वस्थ जीवन सम्भव नहीं, अतः उसका संरक्षण हम सबका दायित्व है।