चरण 1: निबन्ध की योजना:
कथन का आशय
समय के साथ बदलता साहित्य
कुछ प्रमुख उदाहरण
दर्पण से आगे, मार्गदर्शक साहित्य
आज के साहित्यकार का कर्तव्य
चरण 2: निबन्ध, साहित्य समाज का दर्पण है:
कथन का आशय:
जिस तरह दर्पण सामने की वस्तु को ज्यों का त्यों दिखा देता है, उसी तरह साहित्य अपने समय के समाज को दिखा देता है। लेखक और कवि समाज से अलग नहीं होते। वे समाज के बीच रहते हैं, उसकी पीड़ा और उमंग को महसूस करते हैं और वही अपनी रचनाओं में लिखते हैं। इसलिए साहित्य पढ़ना किसी युग को आँखों से देखने जैसा है।
समय के साथ बदलता साहित्य:
समाज कभी एक जैसा नहीं रहता। राजनीति, धर्म, अर्थव्यवस्था और शिक्षा बदलती हैं तो लोगों के विचार भी बदलते हैं। साहित्य इन सभी बदलावों को अपने भीतर समेटता चलता है। वीरगाथाओं में राजाओं की वीरता, भक्ति-साहित्य में ईश्वर के प्रति समर्पण और आधुनिक साहित्य में आम आदमी की चिन्ता, यह क्रम समाज के बदलाव का ही परिणाम है।
कुछ प्रमुख उदाहरण:
कबीर की साखियों में समाज के अन्धविश्वास और भेदभाव पर तीखा प्रहार मिलता है। तुलसीदास का रामचरितमानस उस युग की धार्मिक आस्था और पारिवारिक मर्यादा को दिखाता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाटकों और कविताओं में अंग्रेजी शासन के शोषण और देश की दुर्दशा का चित्र है। प्रेमचन्द का गोदान भारतीय किसान के संघर्ष का सजीव दस्तावेज है। इन रचनाओं से उस समय का समाज हमारे सामने खड़ा हो जाता है।
दर्पण से आगे, मार्गदर्शक साहित्य:
अच्छा साहित्य केवल समाज का चित्र नहीं दिखाता, वह उसे सुधारने का काम भी करता है। बुराइयों को सामने रखकर वह पाठक के मन में प्रश्न जगाता है और बेहतर समाज का सपना दिखाता है। देशभक्ति की कविताओं ने स्वतन्त्रता आन्दोलन में लोगों को संघर्ष की शक्ति दी। इस प्रकार साहित्य समाज को बदलने वाली शक्ति भी है।
आज के साहित्यकार का कर्तव्य:
आज के लेखक को समाज की सच्ची तस्वीर दिखानी चाहिए। उसे गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और नारी-अपमान जैसे प्रश्नों पर निष्पक्ष होकर लिखना चाहिए। साथ ही उसकी रचना में सद्भाव, मानवता और आशा का सन्देश भी होना चाहिए।
अन्त में:
निश्चय ही साहित्य समाज का दर्पण है, क्योंकि उसमें हर युग की धड़कन सुनाई देती है। जब यह दर्पण स्वच्छ और सच्चा हो, तभी समाज अपनी कमियाँ पहचानकर आगे बढ़ पाता है।
निष्कर्ष:
साहित्य समाज को उसका चेहरा भी दिखाता है और उसे सुन्दर बनाने की राह भी।